श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  11.22.42 
इन्द्रियायनसृष्‍ट्येदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि ।
बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि मन, जो इंद्रियों का निवास है, एक नए शरीर के साथ अपनी पहचान बना लेता है, इसलिए उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणियाँ, ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे कि ये आत्मा की वास्तविकता के भीतर मौजूद हों। इस प्रकार आत्मा बाहरी और आंतरिक द्वैत पैदा करता है, जैसे कि कोई व्यक्ति बुरे बेटे को जन्म देता है।
 
Since the mind, which is the seat of the senses, identifies itself with the new body, the three material categories of high, middle and low appear as if present within the reality of the soul. Thus the soul produces external and internal duality, just as a man gives birth to a bad son.
तात्पर्य
भिन्न-भिन्न देहों का ऐश्वर्य, सौंदर्य, शक्ति, बुद्धि, कीर्ति और वैराग्य उनके भौतिक पदार्थों के अनुसार उतम, मध्यम या अधम माने जाते हैं। जीव आत्मा एक ख़ास शरीर को प्राप्त करती है और इस तरह अपने आपको और दूसरों को अपने भौतिक पद के हिसाब से श्रेष्ठ, मध्यम या निम्न श्रेणी का समझती है। वास्तव में, नित्य आत्मा भौतिक द्वंद से परे स्थित रहती है लेकिन ग़लती से भौतिक शरीर की परिस्थिति को अपनी परिस्थिति समझती है। 'असज्जन कृत यथा' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। एक पिता स्वभाव से शांत हो सकता है, लेकिन उसकी वजह से उसका बेटा किसी मुसीबत में पड़ जाता है, पिता को मजबूरन अपने बेटे का पक्ष लेना पड़ता है और अपने बेटे के दुश्मनों को पूरे परिवार का दुश्मन समझना पड़ता है। इस तरह बुरे बेटे की वजह से पिता मुश्किल भरे विवादों में उलझ जाता है। इसी तरह से, जीव आत्मा में कोई समस्या नहीं होती, लेकिन जब वह भौतिक शरीर के साथ मिथ्या तादात्म्य का निर्माण करती है तो शरीर के सुख और दुख में उलझ जाती है। इस श्लोक में, भगवान शरीर और आत्मा के भेद के विषय में अपनी चर्चा का सार देते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)