जन्म त्वात्मतया पुंस: सर्वभावेन भूरिद ।
विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथ: ॥ ४० ॥
अनुवाद
हे परम दानी उद्धव, जिसे जन्म कहते हैं, वह एक नवीन शरीर के साथ मनुष्य का पूर्ण एकीकरण है। मनुष्य नए शरीर को उसी प्रकार स्वीकार करता है जिस प्रकार कोई स्वप्न या कल्पना के अनुभव को वास्तविकता मान लेता है।
O most charitable Uddhava, what is called birth is the complete identification of man with the new body. Man accepts the new body in the same way as one accepts a dream experience or a fantasy as true.
तात्पर्य
अपने भौतिक शरीर के साथ पहचाना बनाने की भावना, रिश्तेदारों या दोस्तों के शरीर के प्रति होने वाले लगाव और आसक्ति से भी ऊपर होती है। यहाँ शब्द 'सर्व-भावना' दर्शाता है कि व्यक्ति स्वयं को भौतिक शरीर के रूप में पूरी तरह से स्वीकार करता है, जैसे कि व्यक्ति स्वप्न के अनुभव को वास्तविक के रूप में पूरी तरह से स्वीकार करता है। व्यावहारिक क्रिया के बिना मात्र कल्पना ही को दिवास्वप्न कहा जाता है; नींद की स्थिति में जो मानसिक कल्पना आती है उसे स्वप्न कहा जाता है। अपने शरीर के साथ हमारी पहचान और स्थायी रूप से शारीरिक संबंधों की हमारी अंध स्वीकृति स्वप्नदर्शन या कल्पना का एक विस्तृत रूप है जिसमें व्यक्ति स्वयं को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से अलग मानता है। इसलिए जन्म की अवधि किसी नए अस्तित्व की पीढ़ी को नहीं दर्शाता है बल्कि आत्मा द्वारा एक नए भौतिक शरीर का अंध स्वीकृति को दर्शाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥