जब जीव अपने वर्तमान शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाता है, जो उसके अपने कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न होता है, तो वह नए शरीर में सुखद और दुखद अनुभवों में लिप्त हो जाता है और पिछले शरीर के अनुभवों को पूरी तरह से भूल जाता है। इस तरह से, किसी न किसी कारण से अपनी पिछली भौतिक पहचान को पूरी तरह से भूल जाना ही मृत्यु कहलाता है।
When the living entity passes from the present body to another body, which is produced by his own karma, he becomes absorbed in the pleasurable and painful experiences of the new body and completely forgets the experience of the previous body. Thus the complete forgetfulness of the previous physical identity, which arises on one pretext or another, is called death.
तात्पर्य
एक व्यक्ति के कर्मों या सफलता कार्यों के आधार पर उसे एक सुंदर, धनवान या प्रभावशाली शरीर प्राप्त हो सकता है या वह जीवन के घृणित स्थिति में अवरुद्ध किया जा सकता है। स्वर्ग या नर्क में जन्म लेकर, सजीव प्राणी अपने अहंकार को नए शरीर से पूरी तरह से पहचानना सीखता है और इस प्रकार नए शरीर के आनंद, भय, ऐश्वर्य या कष्ट में लीन हो जाता है, पिछले शरीर के अनुभवों को पूरी तरह से भूल जाता है। मृत्यु तब होती है जब एक भौतिक शरीर को आवंटित विशिष्ट कर्म समाप्त हो जाते हैं। चूंकि उस विशेष शरीर का कर्म समाप्त हो जाता है, यह अब किसी के दिमाग पर कार्य नहीं कर सकता; इस तरह से व्यक्ति पिछले शरीर को भूल जाता है। नया शरीर प्रकृति द्वारा बनाया गया है ताकि व्यक्ति वर्तमान में प्रभावी कर्म का अनुभव कर सके। नतीजतन किसी की पूरी चेतना किसी के वर्तमान शरीर में इसलिए समा जाती है कि वह अपनी पिछली गतिविधियों के परिणामों का पूरी तरह से अनुभव कर सके। क्योंकि सजीव प्राणी स्वयं को शरीर के रूप में गलत तरीके से पहचानता है, देह की मृत्यु को आत्मा की मृत्यु के रूप में अनुभव किया जाता है। वास्तव में, हालाँकि, आत्मा शाश्वत है और कभी भी निर्माण या विनाश के अधीन नहीं है। आत्म-साक्षात्कार का यह विश्लेषणात्मक ज्ञान कृष्ण चेतना में आसानी से समझा जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥