बद्ध आत्मा निरंतर भौतिक अनुभव के प्रवाह के कारण व्याकुल हो जाती है जिसमें सीधी प्रत्यक्षता और इस संसार की वस्तुओं के सार संकल्पना शामिल होती है। इस प्रकार वह भगवान के साथ अपने संबंध की अपनी आध्यात्मिक स्मृति को खो देती है। जैसे ही कोई इस संसार के साथ तादात्म्य करता है, वह अपनी शाश्वत पहचान को भूल जाता है और माया द्वारा निर्मित मिथ्या अहंकार को समर्पित कर देता है।
