श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  11.22.32 
एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु- ।
र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
इसी तरह, त्वचा, कान, आंखें, जीभ और नाक जैसी इन्द्रियां और सूक्ष्म शरीर के कार्य—जैसे बद्ध चेतना, मन, बुद्धि और अहंकार—की भी व्याख्या इन्द्रिय, अनुभूति के विषय और अधिष्ठाता देवता के त्रिगुणात्मक भेद के रूप में की जा सकती है।
 
Similarly, the sense organs such as the skin, ears, eyes, tongue and nose, and the functions of the subtle body—such as conditioned consciousness, mind, intellect and ego—can be explained in terms of the threefold difference between the sense organ, the object of perception, and the presiding deity.
तात्पर्य
व्यक्तिगत आत्मा का इंद्रियों, इंद्रियगम्य वस्तुओं और नियंत्रक देवताओं के परस्पर-आश्रित भौतिक कार्यों से कोई स्थायी संबंध नहीं होता है। जीव मूल रूप से पवित्र अनात्म आत्मा होता है और आध्यात्मिक दुनिया में भगवान के व्यक्तित्व पर निर्भर रहने के लिए होता है। पदार्थ और आत्मा का एक ही श्रेणी में विश्लेषण करने का प्रयास करना व्यर्थ है, क्योंकि वे भगवान की अलग-अलग क्षमता से संबंधित होते हैं। इस प्रकार आध्यात्मिक रूप से भगवान, उनके निवास और स्वयं को समझने की क्रिया शुद्ध कृष्ण चेतना में प्राप्त की गई एक पूरी तरह से भौतिक विरोधी प्रक्रिया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)