यहां सर्ग शब्द शरीर के भौतिक समामेलन को संदर्भित करता है, जो जीवित इकाई को कवर करता है। भौतिक शरीर निरंतर परिवर्तन से गुजरता है और इस प्रकार जीवित इकाई से स्पष्ट रूप से भिन्न होता है, जो हमेशा समान रहता है। भगवान के दिव्य राज्य में कोई संघर्ष या आंदोलन नहीं होता है जो भौतिक दुनिया में सृजन, रखरखाव और विनाश के कारण होता है। वहां सभी विविधता कृष्ण चेतना के दिव्य प्रेमपूर्ण अनुभव में हल हो जाती है, जो आत्मा की प्राकृतिक संवैधानिक स्थिति है।
