श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  11.22.29 
श्रीभगवानुवाच
प्रकृति: पुरुषश्चेति विकल्प: पुरुषर्षभ ।
एष वैकारिक: सर्गो गुणव्यतिकरात्मक: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा: हे पुरुषों में श्रेष्ठ, भौतिक प्रकृति और उसका आनंद लेने वाला स्पष्ट रूप से अलग हैं। यह प्रकट सृष्टि प्रकृति के गुणों की हलचल पर आधारित होने के कारण लगातार बदलती रहती है।
 
The Lord said: O best of men, nature and its enjoyer are clearly distinct. This manifested universe is constantly transformed because it is based on the disturbance of the modes of nature.
तात्पर्य
पुरुष शब्द जीवधारियों और साथ ही परम स्वामी को भी इंगित करता है जो सर्वोच्च जीवधारी हैं। भौतिक प्रकृति, परिवर्तन के अधीन, द्वैत से भरी है, जबकि भगवान एक और निरपेक्ष हैं। भौतिक प्रकृति अपने निर्माता, संरक्षक और विनाशक पर निर्भर है, हालाँकि, भगवान पूरी तरह से आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हैं। उसी तरह, भौतिक प्रकृति अचेतन और नीरस है, जिसमें आत्म-जागरूकता की कमी है, जबकि सर्वोच्च भगवान आत्मनिर्भर सर्वज्ञता हैं। व्यक्तिगत जीवित इकाई भगवान के व्यक्तित्व की अनंत काल, आनंद और ज्ञान को साझा करती है और भौतिक प्रकृति से पूरी तरह से अलग भी है।

यहां सर्ग शब्द शरीर के भौतिक समामेलन को संदर्भित करता है, जो जीवित इकाई को कवर करता है। भौतिक शरीर निरंतर परिवर्तन से गुजरता है और इस प्रकार जीवित इकाई से स्पष्ट रूप से भिन्न होता है, जो हमेशा समान रहता है। भगवान के दिव्य राज्य में कोई संघर्ष या आंदोलन नहीं होता है जो भौतिक दुनिया में सृजन, रखरखाव और विनाश के कारण होता है। वहां सभी विविधता कृष्ण चेतना के दिव्य प्रेमपूर्ण अनुभव में हल हो जाती है, जो आत्मा की प्राकृतिक संवैधानिक स्थिति है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)