त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्र शक्तित: ।
त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापर: ॥ २८ ॥
अनुवाद
केवल आपसे ही प्राणियों का ज्ञान आता है और उसी शक्ति से ज्ञान चला जाता है। निश्चित रूप से, आपके अलावा कोई भी अन्य व्यक्ति आपकी माया की वास्तविक प्रकृति या असली स्वरुप को नहीं समझ सकता।
It is from you that the knowledge of living beings arises and it is from your power that that knowledge disappears. Of course, no one other than you can know the real nature of your Maya.
तात्पर्य
जैसा कि भगवद गीता में कहा गया है, मत्त: स्मृति ज्ञानम् अपोहनम् च: "ज्ञान, और भूल मुझे से ही आते हैं." भगवान की अकृपा दया से ही व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर पाता है, और भगवान की माया शक्ति से वो ज्ञान नष्ट हो जाता है और व्यक्ति फिर से अज्ञान में डूब जाता है. जो व्यक्ति माया के अधीन हैं, वे भौतिक देह और आत्मा के बीच का भेद नहीं समझ पाते हैं, इसलिए उन्हें प्रभु स्वयं ही इस माया प्रपंच को नष्ट करने की बात सुनाते हैं.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥