श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  11.22.27 
एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि ।
छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणै: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
हे कमलनयन कृष्ण, हे सर्वज्ञ, आप कृपया अपने उन वाक्यों से मेरे हृदय के इस बड़े संकट को दूर कीजिए जो आपके श्रेष्ठ विवेक कौशल के दर्शक हैं।
 
O lotus-eyed Krsna, O Omniscient, please dispel this great doubt in my heart with Your words which demonstrate Your supreme reasoning power.
तात्पर्य
श्री उद्धव ने भगवान कृष्ण से विनती की कि वह उन्हें भौतिक शरीर और आत्मा के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से बताएँ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)