श्रीउद्धव उवाच
प्रकृति: पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ ।
अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयो: ।
प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथात्मनि ॥ २६ ॥
अनुवाद
श्री उद्धव ने पूछा: हे कृष्ण! प्रकृति और जीव स्वाभाविक रूप से अलग हैं। लेकिन, उनके बीच कोई भेद दिखाई नहीं देता। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे एक-दूसरे के अंदर रहते हैं। इसीलिए, आत्मा प्रकृति के अंदर और प्रकृति आत्मा के अंदर दिखाई देती है।
Sri Uddhava asked: O Krishna, although nature and living entities are different in nature, no difference can be seen between them because they are found to reside within each other. Thus the soul appears to be within nature and nature appears to be within the soul.
तात्पर्य
श्री उद्धव ने यहाँ एक शंका प्रकट की है जो एक साधारण बद्ध जीव के हृदय में उठती है। यद्यपि वैदिक शास्त्र यह घोषित करते हैं कि भौतिक शरीर प्रकृति के भौतिक गुणों से बना एक अस्थायी निर्माण है, परन्तु उस शरीर में निवास करने वाला चेतन जीव वास्तव में एक नित्य आध्यात्मिक आत्मा है। भगवद् गीता में भगवान कृष्ण ने शरीर के घटकों तत्वों को अपनी अलग, निम्नतर ऊर्जा घोषित किया है, जबकि जीव भगवान की श्रेष्ठ, चेतन ऊर्जा है। फिर भी, बद्ध जीवन में भौतिक शरीर और बद्ध आत्मा अविभाज्य प्रतीत होते हैं और इस प्रकार अभिन्न दिखाई देते हैं। क्योंकि जीव माँ के गर्भ में आता है और धीरे-धीरे एक विकसित शरीर में प्रकट होता है, इसलिए आत्मा भौतिक प्रकृति में गहराई से प्रविष्ट हुई प्रतीत होती है। इसी तरह, भौतिक शरीर के साथ आत्मा की पहचान से, शरीर आत्मा की चेतना में गहराई से प्रवेश करता हुआ प्रतीत होता है। इसके अलावा, आत्मा की उपस्थिति के बिना शरीर अस्तित्व में नहीं रह सकता। इस स्पष्ट आपसी निर्भरता से, शरीर और आत्मा के बीच का अंतर अस्पष्ट हो जाता है। इसलिए इस मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए श्री उद्धव भगवान से प्रश्न पूछते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥