सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी ।
सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्त ईक्षते ॥ १७ ॥
अनुवाद
सृष्टि की शुरुआत में, सत्व, रज और तम गुणों के माध्यम से प्रकृति ब्रह्मांड में सभी सूक्ष्म कारणों और स्थूल अभिव्यक्तियों से युक्त होकर अपना रूप लेती है। भगवान भौतिक अभिव्यक्ति की पारस्परिक क्रिया में शामिल नहीं होते, बल्कि केवल प्रकृति पर दृष्टि डालते हैं।
At the beginning of creation, Nature assumes her form in this universe by the modes of goodness, passion and ignorance, consisting of all the subtle causes and gross manifestations. God does not enter into the interaction of the physical manifestations, but merely looks upon Nature.
तात्पर्य
भगवान का व्यक्तित्व सूक्ष्म और स्थूल भौतिक तत्वों की तरह परिवर्तन के अधीन नहीं होता है। इस प्रकार भगवान अव्यक्त हैं, या किसी भी ब्रह्माण्डीय विकास के चरण में भौतिक रूप से प्रकट नहीं हैं। भौतिक तत्वों को सूचीबद्ध करने की विशिष्ट पद्धति के बावजूद, भगवान संपूर्ण ब्रह्मांडीय स्थिति के अंतिम निर्माता, पालनकर्ता और विनाशकर्ता बने रहते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥