पुरुष: प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिल: ।
ज्योतिराप: क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव ॥ १४ ॥
अनुवाद
मैंने नौ मूल तत्वों का वर्णन भोक्ता आत्मा, प्रकृति, महत् तत्व की आदि अभिव्यक्ति, मिथ्या अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के रूप में किया है।
I have described the nine basic elements as the enjoyer soul, nature, the original manifestation of the great principle, false ego, sky, air, fire, water and earth.
तात्पर्य
प्रकृति, या स्वभाव, मूल रूप से अव्यक्त होता है और बाद में महत-तत्त्व के रूप में प्रकट होता है। यद्यपि जीव पुरुष है, एक उपभोक्ता, वास्तविक प्रक्रिया जिसके द्वारा वह आनंद ले सकता है, वह भगवान की दिव्य इंद्रियों को संतुष्ट करके है, जैसे कि हाथ पेट को भोजन की आपूर्ति करके खाता है। भौतिक प्रकृति के भीतर जीव एक झूठा उपभोक्ता बन जाता है, भगवान के प्रति अपनी अधीनता को भूल जाता है। भौतिक तत्वों के साथ ही जीव और परमात्मा का इस प्रकार व्यवस्थित रूप से विश्लेषण किया जाता है ताकि सशर्त आत्मा को भौतिक प्रकृति से परे उसकी वास्तविक संवैधानिक स्थिति का प्रदर्शन किया जा सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥