श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  11.22.13 
सत्त्वं ज्ञानं रज: कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते ।
गुणव्यतिकर: काल: स्वभाव: सूत्रमेव च ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में सतोगुण को ज्ञान, रजोगुण को काम के लिए कर्म करने की इच्छा और तमोगुण को अज्ञानता माना जाता है। समय को भौतिक गुणों की अशांत अंतःक्रिया के रूप में देखा जाता है और सभी कार्य करने की प्रवृत्ति आदि सूत्र या महत्-तत्व से होती है।
 
In this world, Satva Guna is considered to be knowledge, Rajo Guna is considered to be Sakaam Karma and Tamo Guna is considered to be ignorance. Time is seen as the disturbed interaction of physical qualities and the attitude of the entire work is revealed from the Adi Sutra i.e. Mahat Tattva.
तात्पर्य
भौतिक तत्वों की परस्पर क्रिया के लिए प्रेरणा समय की अग्रगति है। क्योंकि समय बीतता है, गर्भ में भ्रूण बढ़ता है, धीरे-धीरे बाहर निकलता है, बड़ा होता है, उप-उत्पाद पैदा करता है, घटता है और मर जाता है। यह सब समय के प्रभाव से होता है। समय कारक की अनुपस्थिति में, भौतिक तत्व परस्पर क्रिया नहीं करते हैं, लेकिन प्रधान के रूप में अक्रिय रहते हैं। भगवान कृष्ण भौतिक जगत की मूल श्रेणियों की स्थापना कर रहे हैं ताकि मनुष्य भगवान की सृष्टि की कल्पना कर सकें। यदि श्रेणियों को संघनित न किया जाता, तो विश्लेषण और वैचारिकरण असंभव हो जाता, क्योंकि भगवान की शक्तियाँ अनंत हैं। यद्यपि मूल विभाजनों के भीतर भौतिक तत्वों के असंख्य विभाजन हैं, आत्मा को हमेशा एक विशिष्ट पारलौकिक तत्व के रूप में समझा जाना चाहिए, जो ईश्वर के राज्य में निवास करने के लिए है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)