प्रकृतेः क्रियमाणानि
गुणैः कर्माणि सर्वशः
अहंकार विमूढ़ात्मा
कर्ताहमिति मन्यते
"प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव में पड़ी भ्रमित आध्यात्मिक आत्मा, स्वयं को कर्मों का कर्ता मानती है, जो वास्तव में प्रकृति द्वारा किए जाते हैं।"
संतुलन की अपनी मूल स्थिति में प्रकृति के तीनों गुण, साथ ही गुणों से उत्पन्न हुई बाद की सृष्टि, उस छोटी जीवित सत्ता की तुलना में बहुत अधिक शक्तिशाली हैं जो उनके द्वारा नियंत्रित होती है। इस प्रकार जीवित सत्ता को भौतिक दुनिया में वास्तविक कर्ता या निर्माता के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। भलाई के गुण को ज्ञान के अनुभव, जुनून के गुण को काम के अनुभव और अज्ञानता के गुण को अंधकार के अनुभव से पहचाना जाता है। भौतिक ज्ञान, कार्य और अंधकार के ये गुण आध्यात्मिक आत्मा से कोई वास्तविक संबंध नहीं रखते हैं, जो अनंत काल तक अपने गुणों, आनंद और ज्ञान (परम प्रभु की संधनी, संविद और हलादिनी शक्ति) को प्रदर्शित करती है। भौतिक मोड का ईश्वर के राज्य के भीतर कोई प्रवेश नहीं है, जिसके असीम वातावरण में शाश्वत जीवित सत्ता रहने के लिए बनी है।
