श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  11.22.10 
अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।
स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत् ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
चूंकि अनादी काल से ही अज्ञानता के आवरण में ढँका हुआ व्यक्ति स्वयं अपना आत्म-साक्षात्कार नहीं कर पाता है, अतः कोई ऐसा दूसरा व्यक्ति होना चाहिए जो ब्रह्म के वास्तविक स्वरुप को पूर्ण रूप से जानता हो और उसे यह ज्ञान प्रदान कर सके।
 
Since a person covered with ignorance since time immemorial is incapable of Self-realization, there must be someone else who knows the Supreme Brahman perfectly and can impart this knowledge to him.
तात्पर्य
हालाँकि भगवान अपनी वस्तुओं के भीतर के विभिन्न तरीकों को सामग्री के कारणों और उनकी वस्तुओं के भीतर भौतिक प्रभावों को सहन करते हैं, लेकिन इस ब्रह्मांड में पाए जाने वाले दो आध्यात्मिक तत्वों के बारे में कोई अटकल नहीं लगाई जा सकती है, अर्थात् व्यक्तिगत आत्मा और अध्यात्म परमात्मा। इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जीव अपने आप को ज्ञानवर्धन करने में असमर्थ है। सर्वोच्च भगवान तत्व-ज्ञा, सर्वज्ञ, और ज्ञानदा, पूरे ब्रह्मांड के आध्यात्मिक गुरु हैं। श्री उद्धव ने उल्लेख किया कि कुछ दार्शनिक पच्चीस तत्वों का वर्णन करते हैं और अन्य पच्चीस तत्वों का। अंतर यह है कि पच्चीस तत्वों में व्यक्तिगत आत्मा और सर्वोच्च आत्मा, भगवान कृष्ण के लिए एक अलग श्रेणी शामिल है, जबकि पच्चीस तत्वों के समर्थक जीव-तत्व और विष्णु-तत्व की दो पारलौकिक श्रेणियों को कृत्रिम रूप से विलय कर देते हैं, जो कि भगवान की शाश्वत श्रेष्ठता को छिपाते हैं। भौतिक प्रकृति के तीन तरीकों पर आधारित ज्ञान पारलौकिक मंच तक नहीं बढ़ सकता है, जहाँ भगवान का व्यक्तित्व रूप, रंग, स्वाद, संगीत ध्वनियों और प्रेम संबंधों की शाश्वत आध्यात्मिक किस्मों के सर्वोच्च आनंददायक के रूप में मौजूद है। सांसारिक दार्शनिक केवल भौतिक भोग और भौतिक त्याग के बीच आगे-पीछे उछलते हैं। मायावाद (अवैयक्तिक) परम सत्य की धारणा के शिकार होने के कारण, वे भगवान के व्यक्तित्व की शरण प्राप्त नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार उन्हें समझ नहीं सकते हैं। क्योंकि मूर्ख, अवैयक्तिक दार्शनिक खुद को सर्वोच्च मानते हैं, वे इस बात की सराहना करने में असमर्थ हैं कि प्रेममय सेवा आध्यात्मिक मंच पर मौजूद है। भगवान के व्यक्तित्व के प्रति दृढ़ता से अस्वीकार्य उपेक्षा करते हुए, अवैयक्तिक अंततः भगवान की भ्रामक शक्ति से अभिभूत हो जाते हैं और भौतिक अस्तित्व के दुखों से गुजरते हैं। दूसरी ओर, वैष्णव भगवान के व्यक्तित्व से ईर्ष्या नहीं करते हैं। वे खुशी-खुशी उनकी शरण और सर्वोच्चता को स्वीकार करते हैं, और इस तरह भगवान व्यक्तिगत रूप से अपने भक्तों का प्रभार लेते हैं और उन्हें प्रबुद्ध करते हैं, उन्हें अपने स्वयं के पारलौकिक आनंद से भरते हैं। सर्वोच्च भगवान के लिए आध्यात्मिक सेवा इस तरह भौतिक सेवा की निराशा और दमन से मुक्त है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)