श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  11.22.1-3 
श्रीउद्धव उवाच
कति तत्त्वानि विश्वेश सङ्ख्यातान्यृषिभि: प्रभो ।
नवैकादश पञ्च त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम ॥ १ ॥
केचित् षड्‌विंशतिं प्राहुरपरे पञ्चविंशतिम् ।
सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे ।
केचित् सप्तदश प्राहु: षोडशैके त्रयोदश ॥ २ ॥
एतावत्त्वं हि सङ्ख्यानामृषयो यद्विवक्षया ।
गायन्ति पृथगायुष्मन्निदं नो वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
उद्धव ने पूछा: हे प्रभु, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, ऋषियों ने सृष्टि के तत्त्वों की कितनी संख्या बतलाई है? मैंने आपके मुख से कुल अठ्ठाइस का वर्णन सुना है—ईश्वर, जीवात्मा, महत तत्त्व, मिथ्या अहंकार, पाँच स्थूल तत्त्व, दस इन्द्रियाँ, मन, पाँच सूक्ष्म इन्द्रिय-विषय तथा तीन गुण। किन्तु कुछ विद्वान छब्बीस तत्त्व बतलाते हैं जबकि अन्य लोग इनकी संख्या पच्चीस या सात, नौ, छह, चार या ग्यारह और कुछ लोग सत्रह, सोलह या तेरह बतलाते हैं। जब ये ऋषि ऐसे विविध प्रकारों से सर्जक तत्त्वों की गणना कर रहे थे, तो उनके मनों में क्या था? हे परम शाश्वत, कृपा करके मुझे यह बतलायें।
 
Uddhava asked: O Lord, O Master of the Universe, how many elements of creation have the sages mentioned? I have heard from your mouth a description of twenty-eight in all—God, the soul, the great element, the false ego, the five gross elements, the ten senses, the mind, the five subtle sense-objects and the three gunas. But some learned men speak of twenty-six elements, while others say twenty-five or seven, nine, six, four or eleven, and some say seventeen, sixteen or thirteen. When these sages were enumerating the creative elements in such various ways, what was in their minds? O Supreme Eternal, kindly tell me this.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण ने पिछले अध्याय में अच्छी तरह से समझाया कि वैदिक ज्ञान भोग-विलास के लिये नहीं है बल्कि भौतिक बंधन से मुक्ति के लिये है। अब उद्धव कुछ मध्यवर्ती प्रश्न प्रस्तुत करते हैं जिनका उत्तर दिया जाना चाहिए ताकि मुक्ति का मार्ग स्पष्ट हो सके। भिन्न-भिन्न दार्शनिकों का भौतिक तत्वों की सही संख्या, किसी विशेष बाहरी वस्तु के अस्तित्व और गैर-अस्तित्व और स्वयं आत्मा के अस्तित्व को लेकर ऐतिहासिक रूप से असहमति रही है। वेद के ज्ञान-कांड अनुभाग का लक्ष्य भौतिक दुनिया की विश्लेषणात्मक समझ और आत्मा को भौतिक से परे एक आध्यात्मिक तत्व के रूप में समझने के द्वारा मुक्ति प्राप्त करना है। अंततः सर्वस्वयं भगवान सभी तत्वों से ऊपर हैं और अपनी व्यक्तिगत शक्ति द्वारा उनका पालन करते हैं। उद्धव विभिन्न ऋषियों की अलग-अलग कार्यप्रणालियों का संख्यात्मक शब्दों में उल्लेख करते हैं, पहले भगवान की अपनी राय का उद्धरण देते हुए। इस संबंध में "अयुष्मान" शब्द, या "अनन्त रूप रखने वाला" महत्वपूर्ण है। चूँकि भगवान कृष्ण शाश्वत हैं, उनके पास अतीत, वर्तमान और भविष्य का सारा ज्ञान है और इस प्रकार वे मूल और सर्वोच्च दार्शनिक हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, श्री उद्धव द्वारा उल्लिखित विभिन्न विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण वास्तव में विरोधाभासी नहीं हैं, क्योंकि वे एक ही वास्तविकता को वर्गीकृत करने के विभिन्न तरीके हैं। वास्तविकता पर नास्तिक अटकलें ईश्वर के अस्तित्व को नहीं पहचानती हैं; फलस्वरूप यह सत्य को समझाने का एक व्यर्थ प्रयास है। भगवान स्वयं ही विभिन्न जीवित संस्थाओं को वास्तविकता पर विभिन्न तरीकों से अटकलबाजी करने और बोलने के लिए सशक्त करते हैं। हालाँकि, वास्तविक वास्तविकता स्वयं भगवान हैं, जो अब श्री उद्धव से बात करेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)