कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यत: स्वत एव वा ।
यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मक: स्मृत: ॥ ९ ॥
अनुवाद
किसी खास समय को शुद्ध माना जाता है जब वह अपने स्वभाव से या उपयुक्त औज़ारों को हासिल करने से, व्यक्ति के नियत कर्तव्य को निभाने के लिए अनुकूल हो। वह समय जो किसी के कर्तव्य में बाधा डालता है, उसे अशुद्ध माना जाता है।
A particular time is considered pure when it is suitable for a person to perform his prescribed duty either by its nature or by the availability of suitable equipment. The time which hinders someone's duty is considered impure.
तात्पर्य
शुद्ध और अशुद्ध स्थानों की चर्चा करने के बाद, प्रभु अब विभिन्न गुणों को लेकर समय की चर्चा करते हैं। निश्चित समय जैसे ब्रह्म मुहूर्त, यानि सूर्योदय से ठीक कुछ घंटे पहले, आध्यात्मिक उन्नति के लिए हमेशा शुभ होता है। अन्य समय अपने आप में शुभ न होते हुए भी भौतिक समृद्धि की प्राप्ति से शुभ हो जाता है जो जीवन में अपने मिशन को सुविधाजनक बनाता है। राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक अशांति जो किसी के धार्मिक कर्तव्यों के निष्पादन में बाधा डालते हैं, अशुभ समय माने जाते हैं। इसी तरह एक महिला को बच्चे के जन्म के तुरंत बाद या मासिक धर्म के दौरान दूषित माना जाता है। वह ऐसे समय में सामान्य धार्मिक गतिविधियों को नहीं कर सकती है, इसलिए अशुभ और अशुद्ध होती है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि सभी समयों में सबसे शुभ समय वह होता है जब कोई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की दया प्राप्त करता है। यदि कोई प्रभु की प्रेममय सेवा की उपेक्षा करता है, जो इंद्रियों की तुष्टि से दूर ले जाती है, तो वह निश्चित रूप से सबसे अशुभ समय में जी रहा है। इसलिए जिस पल कोई सर्वोच्च भगवान या प्रभु के शुद्ध भक्त के साथ जुड़ाव प्राप्त करता है, वह सबसे शुभ समय है, जबकि ऐसे संबंध को खोने का क्षण सबसे अशुभ होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन की पूर्णता केवल कृष्ण चेतना है, जिसके द्वारा व्यक्ति भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के कारण होने वाली समय और स्थान की द्वंद्वता को पार कर जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥