श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  11.21.8 
अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योऽशुचिर्भवेत् ।
कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीकटासंस्कृतेरिणम् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
जिन स्थानों में चित्तीदार हिरण नहीं पाए जाते, जहाँ ब्राह्मणों के प्रति भक्ति का अभाव है, जहाँ चित्तीदार हिरण होते हैं, लेकिन सम्माननीय लोग नहीं होते हैं, कीकट जैसे स्थान और जहाँ स्वच्छता और संस्कारों की उपेक्षा की जाती है, जहाँ मांस खाने वालों का प्रभुत्व है या जहाँ पृथ्वी बंजर है, ऐसे स्थानों को दूषित माना जाता है।
 
Among the places, those are considered to be impure which are devoid of spotted deer, which are devoid of devotion towards the Brahmanas, which have spotted deer but are devoid of honourable persons, regions like Keekat, and places where cleanliness and rituals are neglected, where flesh-eaters predominate or where the earth is barren.
तात्पर्य
शब्द कृष्णसार का अर्थ है चीतल मृग, जिसके चर्म का उपयोग ब्रह्मचारियों द्वारा आध्यात्मिक गुरु के आश्रम में रहने के दौरान किया जाता है। ब्रह्मचारी कभी जंगल में शिकार नहीं करते, बल्कि पहले से ही मर चुके जानवरों से खाल स्वीकार करते हैं। काले या चित्तीदार मृग की खाल का उपयोग वैदिक यज्ञ के निष्पादन में शिक्षा प्राप्त करने वालों द्वारा वस्त्र के रूप में भी किया जाता है। इसलिए, चूंकि ऐसे जीवों से रहित क्षेत्रों में यज्ञ ठीक से नहीं किया जा सकता है, इसलिए ये स्थान अशुद्ध हैं। इसके अलावा, हालांकि किसी विशेष स्थान के निवासी फलदायी गतिविधियों और अनुष्ठानिक यज्ञों को करने में विशेषज्ञ हो सकते हैं, लेकिन यदि वे भगवान की भक्ति सेवा के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, तो ऐसा स्थान भी प्रदूषित है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि पहले बिहार और बंगाल प्रांत भगवान की भक्ति सेवा से रहित थे और उन्हें अशुद्ध माना जाता था। तब जयदेव जैसे महान वैष्णव इन क्षेत्रों में प्रकट हुए, उन्हें पवित्र स्थानों में परिवर्तित किया।

शब्द असौवीर उन स्थानों को इंगित करता है जहां सुवीर, सम्मानीय संत व्यक्ति नहीं रहते। आम तौर पर, जो व्यक्ति राज्य के कानूनों का पालन करता है उसे एक सम्मानित नागरिक माना जाता है। उसी तरह, जो व्यक्ति ईश्वर के कानून का सख्ती से पालन करता है उसे एक संस्कारी या सभ्य व्यक्ति, सुवीर माना जाता है। जिस स्थान पर ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति रहते हैं उसे सौवीर कहा जाता है। कीकट आधुनिक बिहार राज्य को संदर्भित करता है, जिसे पारंपरिक रूप से असभ्य पुरुषों के क्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा है। हालाँकि, ऐसे प्रांतों में भी, कोई भी स्थान जहाँ साधु-संत इकट्ठा होते हैं, उसे पवित्र माना जाता है। दूसरी ओर, आम तौर पर सम्मानित व्यक्तियों का एक प्रांत पापी लोगों की मौजूदगी से तुरंत प्रदूषित हो जाता है। असंस्कृत का अर्थ बाहरी सफाई की कमी है, साथ ही आंतरिक सफाई के लिए शुद्धिकरण समारोहों की अनुपस्थिति है। श्रील माधवाचार्य स्कंद पुराण से उद्धृत करते हैं: "धार्मिक लोगों को नदियों, महासागरों, पहाड़ों, आश्रमों, जंगलों, आध्यात्मिक शहरों या उन स्थानों के आठ मील के दायरे में रहना चाहिए जहाँ शालिग्राम-शिला पाई जाती है। अन्य सभी स्थानों पर कीकट या दूषित माना जाना चाहिए। लेकिन अगर ऐसी दूषित जगहों में भी काले और चित्तीदार मृग पाए जाते हैं, तो व्यक्ति वहाँ तब तक रह सकता है जब तक कि पापी लोग भी मौजूद न हों। अगर पापी लोग मौजूद भी हैं, अगर नागरिक शक्ति सम्मानित अधिकारियों के हाथ में है, तो व्यक्ति रह सकता है। इसी तरह, व्यक्ति जहाँ भी विष्णु की मूर्ति को विधिवत स्थापित और पूजा जाता है, वहाँ रह सकता है।"

भगवान यहाँ पवित्रता और पाप के विषय पर विस्तार करते हैं, जो पवित्रता और अशुद्धता पर आधारित हैं। इस प्रकार निवास के शुद्ध और दूषित स्थानों का यहाँ वर्णन किया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)