देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम ।
गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम् ॥ ७ ॥
अनुवाद
हे संत उद्धव, मैंने भौतिकतावादी कर्मों को सीमित करने के लिए निश्चित किया है कि सभी भौतिक वस्तुओं में, जिनमें समय, स्थान और सभी भौतिक वस्तुएँ शामिल हैं, क्या उचित है और क्या अनुचित है।
O Saint Uddhava, in order to restrain materialistic activities, I have ascertained what is right and what is wrong in place, time and all material objects.
तात्पर्य
इस श्लोक में शब्द नियामार्तम ("रोकने की दृष्टि से") सार्थक है। एक सशर्त आत्मा झूठे तौर पर अपनी भौतिक इन्द्रियों से तादात्म्य स्थापित करता है और इसलिए वह चीज़ जिसे तुरंत शारीरिक संतुष्टि प्राप्त हो उसे वह अच्छा मानता है और असुविधाजनक या परेशान करने वाली किसी भी चीज़ को वह बुरा मानता है। हालाँकि, उच्च बुद्धि से, एक व्यक्ति दीर्घकालिक निजी हित और खतरे को पहचानता है। उदाहरण के लिए, दवाई तुरंत कड़वी लग सकती है, लेकिन अपने दीर्घकालिक हित की गणना करके कोई व्यक्ति एक ऐसी बीमारी को ठीक करने के लिए कड़वी दवा ले लेता है जो तुरंत तकलीफदेह नहीं होती लेकिन अंततः घातक होती है। इसी तरह, वैदिक साहित्य भौतिक दुनिया के सभी पदार्थों और कार्यों के बीच क्या उचित है और क्या अनुचित है, इसे स्थापित करके मानव की पाप प्रवृत्तियों को प्रतिबंधित करता है। क्योंकि प्रत्येक को खाना पड़ता है, वैद मांस, मछली और अंडे जैसे पापपूर्ण भोजन को नहीं बल्कि सतोगुण के भोजन को निर्धारित करते हैं। इसी तरह, एक व्यक्ति को बताया जाता है कि वह एक शांत और पवित्र समुदाय में रहे, पापी लोगों के साथ या अशुद्ध या अशांत वातावरण में न रहे। भौतिक दुनिया के दोहन को नियुक्त करके और प्रतिबंधित करके, वैदिक ज्ञान धीरे-धीरे एक सशर्त आत्मा को भौतिक अच्छाई के स्तर पर लाता है। उस चरण पर वह ईश्वर के परम व्यक्तित्व की सेवा करने और जीवन के भौतिक चरण में प्रवेश करने का अधिकारी बन जाता है। यह याद रखना चाहिए कि ऐसी मात्र अधिकता वास्तविक योग्यता का गठन नहीं करती है; कृष्ण चेतना के बिना मात्र सांसारिक पवित्रता एक सशर्त आत्मा को कभी भी घर वापस, भगवान के पास वापस जाने के लिए योग्य नहीं बना सकती। इस दुनिया के अंदर हम सभी झूठे गर्व से संक्रमित हैं, जिसे वैदिक नियमों के निर्देशों के अन्तर्गत आने से कम किया जाना चाहिए। जो व्यक्ति ईश्वर की प्रेमपूर्ण सेवा में पूरी तरह से लगा हुआ है उसे यह प्रारंभिक तरीके अपनाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह समर्पण की सहज प्रक्रिया के द्वारा सीधे भगवान के व्यक्तित्व से संपर्क करता है। पिछले श्लोक में भगवान ने यह समझाया कि क्यों वैदिक साहित्य अलग-अलग जीवों के शरीरों को अलग-अलग मूल्य प्रदान करता है, और यहाँ भगवान इन शरीरों के साथ परस्पर क्रिया करने वाले भौतिक पदार्थों के संबंध में वैदिक मूल्य प्रणाली की व्याख्या करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥