श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  11.21.6 
वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि ।
धातुषूद्धव कल्प्यन्त एतेषां स्वार्थसिद्धये ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
हे उद्धव, यद्यपि सभी भौतिक शरीर एक ही पाँच तत्वों से बने हैं और इस प्रकार वे सभी समान हैं, किन्तु वैदिक ग्रंथ ऐसे शरीरों की विभिन्न नामों और रूपों में कल्पना करते हैं ताकि जीव अपनी जीवन की साधना को प्राप्त कर सकें।
 
O Uddhava, although all bodies are composed of the same five elements and are therefore the same, the Vedic texts conceive of such bodies under different names and forms by which the living entities can achieve their life goals.
तात्पर्य
नामा-रूपाणि विषमाणि शब्द वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं जिसमें समाज के सदस्यों को चार सामाजिक और चार व्यावसायिक विभागों के अनुसार नामित किया जाता है। बौद्धिक या धार्मिक पूर्णता के लिए समर्पित लोगों को ब्राह्मण कहा जाता है, राजनीतिक पूर्णता के लिए समर्पित लोगों को क्षत्रिय कहा जाता है, वित्तीय पूर्णता के लिए समर्पित लोगों को वैश्य कहा जाता है और खाने, सोने, यौन संबंध और ईमानदार काम के लिए समर्पित लोगों को शूद्र कहा जाता है। ऐसी प्रवृत्तियाँ भौतिक प्रकृति के तीन प्रकारों (गुण, जुनून और अज्ञानता) से उत्पन्न होती हैं क्योंकि विशुद्ध आत्मा भौतिक रूप से बौद्धिक, शक्तिशाली, उद्यमी या दास भावना रखने वाली नहीं होती है। बल्कि, शुद्ध आत्मा हमेशा परमेश्वर के प्रति प्रेम भक्ति में लीन रहती है। अगर एक शर्तित आत्मा की विभिन्न प्रवृत्तियों को वर्णाश्रम व्यवस्था में नहीं लगाया जाता है तो उनका निश्चित रूप से दुरुपयोग होगा और इस प्रकार वह व्यक्ति मानव जीवन के मानक से नीचे गिर जाएगा। वैदिक व्यवस्था प्रभु द्वारा डिज़ाइन की गई है ताकि शर्तित आत्माएँ अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों का अनुसरण कर सकें और साथ ही साथ जीवन के अंतिम लक्ष्य कृष्ण चेतना की ओर बढ़ सकें। जैसे एक डॉक्टर एक पागल आदमी से उसकी जिंदगी की गलत अवधारणा के संदर्भ में सहानुभूतिपूर्वक बात करके उसका इलाज करता है वैसे ही वह जो वैदिक साहित्य को समझता है जीवित प्राणियों को पदार्थ के तत्वों के साथ अपने भ्रमपूर्ण तादात्म्य के अनुसार संलग्न करता है। यद्यपि सभी भौतिक शरीर एक ही भौतिक तत्वों से बने होते हैं और इस प्रकार गुणात्मक रूप से समान होते हैं जैसा कि यहाँ एक ही शब्द द्वारा वर्णित किया गया है, वैदिक सामाजिक व्यवस्था, वर्णाश्रम भौतिक पहचान की विभिन्न डिग्री के अनुसार सभी मनुष्यों को कृष्ण चेतना में संलग्न करने के लिए बनाई गई है। पूर्णतः अच्छा स्वयं परमेश्वर है और जो परमेश्वर के समान हो जाता है वह भी अच्छाई बन जाता है। क्योंकि सूर्य इस दुनिया में ऊष्मा का स्रोत है एक वस्तु जो सूर्य के करीब आती है गर्म और गर्म हो जाती है जब तक कि वह आग में न मिल जाए। इसी तरह जैसे जैसे हम भगवान के व्यक्तित्व के पारलौकिक स्वरूप के निकट आते हैं हम अपने आप निरपेक्ष भलाई से प्रभारित हो जाते हैं। यद्यपि यह ज्ञान वैदिक साहित्य का वास्तविक आधार है दुनियावी धर्मनिष्ठा का पालन किया जाता है और पाप को निषिद्ध किया जाता है ताकि व्यक्ति धीरे धीरे भौतिक भलाई के मंच पर आ सके जिस पर आध्यात्मिक ज्ञान स्पष्ट हो सके।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)