श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  11.21.5 
भूम्यम्ब्वग्‍न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्चधातव: ।
आब्रह्मस्थावरादीनां शारीरा आत्मसंयुता: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – ये पाँच मूलभूत तत्त्व हैं जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। ये तत्त्व ही समस्त जीवों के शरीर का निर्माण करते हैं, चाहे वो देवता हो, मनुष्य हो या जानवर। ये सभी तत्त्व एक ही परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।
 
Earth, water, fire, air and sky – these are the five fundamental elements from which the bodies of all conditioned living beings, from Brahma to inanimate beings, are made up. All these elements originate from one God.
तात्पर्य
सभी पदार्थक शरीर उन्ही पांच स्थूल तत्वों के विभिन्न अनुपात से बने होते हैं, जो कि भगवान के व्यक्तित्व से उत्पन्न होते हैं और जीवों को ढकते हैं, जो सभी जीव श्रेणी में हैं। अच्छे और बुरे की अवधारणाएं भगवान की पसंद पर निर्भर करती हैं न कि भौतिक वस्तुओं में निहित गुणात्मक अंतर पर। एक कृष्ण-भावना व्यक्ति अंततः सभी भौतिक घटनाओं को एक के रूप में देखता है। भक्त का अच्छा व्यवहार, बुद्धिमान विवेक और भौतिक दुनिया के भीतर कलात्मक भावना सभी भगवान की इच्छा पर आधारित है। भौतिक तत्व, जो भगवान के अवतरण हैं, अंततः सभी भिन्न नहीं हैं। हालाँकि, सांसारिक पवित्रता के पैरोकारों को डर है कि अगर अच्छे और बुरे का भौतिक द्वंद्व कम हो जाता है, तो लोग अनैतिक या अराजक हो जाएंगे। निश्चित रूप से आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा प्रचारित अवैयक्तिक और नास्तिक दर्शन, जिसमें भौतिक विविधता को केवल आणविक और परमाणु कणों के गणितीय विवरणों तक सीमित कर दिया गया है, अनैतिक समाज की ओर जाता है। यद्यपि भौतिक विज्ञान और वैदिक ज्ञान दोनों भौतिक विविधता के भ्रम को उजागर करते हैं और सभी भौतिक ऊर्जा की परम एकता को उजागर करते हैं, केवल भगवान कृष्ण के भक्त ही ईश्वर की इच्छा की सर्वोच्च निरपेक्ष पवित्रता के प्रति समर्पित हैं। इस प्रकार वे हमेशा सभी जीवित संस्थाओं के लाभ के लिए कार्य करते हैं, भगवान की इच्छा के अनुसार भगवान की सेवा में भौतिक विविधता को स्वीकार करते हैं। कृष्ण-भावना, या ईश्वर-भावना के बिना, लोग आध्यात्मिक अच्छाई की निरपेक्ष स्थिति को नहीं समझ सकते हैं; इसके बजाय वे कृत्रिम रूप से भौतिक मंच पर अन्योन्याश्रित स्वार्थ पर आधारित सभ्यता का निर्माण करने का प्रयास करते हैं। इस तरह की एक मूर्खतापूर्ण व्यवस्था आसानी से ध्वस्त हो जाती है, जैसा कि आधुनिक युग में व्यापक सामाजिक संघर्ष और अराजकता से पता चलता है। सभ्य समाज के सभी सदस्यों को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का पूर्ण अधिकार स्वीकार करना चाहिए, और तब सामाजिक शांति और सद्भाव सांसारिक पवित्रता और पाप के कमजोर सापेक्ष मंच पर नहीं टिकेगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)