श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  11.21.4 
दर्शितोऽयं मयाचारो धर्ममुद्वहतां धुरम् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
मैंने यह जीवन शैली उन लोगों के लिए व्यक्त की है जो लौकिक धार्मिक नियमों के बोझ का वहन कर रहे हैं।
 
I have revealed this way of life to those who are carrying the burden of worldly religious doctrines.
तात्पर्य
किसी भी धर्म के सामान्य सिद्धांत, अनगिनत नियमों, विनियमों और निषेधाज्ञाओं को बताते हैं, निस्संदेह कृष्ण चेतना से वंचित लोगों के लिए एक बड़ा बोझ हैं। श्रीमद भागवतम (1.1.11) के प्रथम कांड में कहा गया है, भूरिणी भूरी - कर्माणि श्रवणीयानि विभागश: : दुनिया में अनगिनत धार्मिक ग्रंथ हैं जो अनगिनत धार्मिक कर्तव्यों को बताते हैं। अधिकृत ग्रंथ वे हैं जो स्वयं प्रभु या उनके प्रतिनिधियों ने बोले हैं, जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है। भगवद गीता (18.66) के अंतिम अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं, सर्व-धर्मान् परि त्याज्य मामेकं शरणं व्रजा: व्यक्ति को सांसारिक धर्मपरायणता का तकलीफदेह बोझ छोड़ देना चाहिए और सीधे प्रभु की प्रेममयी सेवा करनी चाहिए, जिसमें सब कुछ सरल हो जाता है। भगवान कृष्ण भी भगवद गीता (9.2) में कहते हैं, सु-सुखं कर्तुम अव्ययं: भक्ति-योग प्रक्रिया, जो पूरी तरह से प्रभु की दया पर निर्भर करती है, बहुत ही हर्षदायक और आसानी से की जाने वाली है। इसी तरह, लोचन दास ठाकुर गाते हैं,

परम करुणा, पाहुँ दुई जना,

नीताई-गौरचंद्र

शबा अवतारा-, सारा-शिरोमणि,

केवल आनंद-कांडा

श्री चैतन्य महाप्रभु, जो स्वयं भगवान कृष्ण हैं, 500 साल पहले प्रभु के पवित्र नामों का जाप करने की महान विधि वितरित करने के लिए प्रकट हुए। इस तरह, कृत्रिम तपस्या का बोझ उठाने के बजाय, व्यक्ति सीधे प्रभु की सेवा कर सकता है, अपने हृदय को शुद्ध कर सकता है और तुरंत ही पारलौकिक आनंद का अनुभव कर सकता है। जो लोग चैतन्य महाप्रभु के आंदोलन में शामिल हो गए हैं, वे चार मूल सिद्धांतों का पालन करते हैं: कोई अवैध यौन संबंध नहीं, मांस, मछली या अंडे नहीं खाना, कोई नशा नहीं करना और कोई जुआ नहीं खेलना। वे सुबह जल्दी उठते हैं, हरे कृष्ण का जाप करते हैं और खुशी से दिन भर प्रभु की सेवा में लीन रहते हैं। जो लोग वेदों के कर्मकांड खंड का अनुसरण करते हैं, वे अनगिनत नियमों, अनुष्ठानों और समारोहों के बोझ से दबे रहते हैं, जिसे पूजा करने वालों को स्वयं करना होता है या उनकी ओर से योग्य ब्राह्मणों को करना होता है। किसी भी क्षण उनके संचित पुण्य के पूरी तरह से नष्ट होने का खतरा होता है। उसी प्रकार, दार्शनिक मार्ग पर चलने वालों को सावधानीपूर्वक दार्शनिक श्रेणियों को परिभाषित करना, परिष्कृत करना और समायोजित करना पड़ता है, एक ऐसी प्रक्रिया जो आमतौर पर भ्रम और निराशा में समाप्त होती है। रहस्य योग के साधक कठोर तपस्या करते हैं, अपने आपको अत्यधिक गर्मी और ठंड, अत्यधिक भूख आदि के अधीन करते हैं। ऐसे सभी भौतिकवादी व्यक्तियों की व्यक्तिगत इच्छाओं को पूरा करना है, जबकि प्रभु के भक्त, जो प्रभु की खुशी चाहते हैं, केवल प्रभु की दया पर निर्भर रहते हैं और वापस परमेश्वर के धाम, वापस चले जाते हैं। पिछले श्लोक में प्रभु ने उल्लेख किया कि भौतिक दुनिया में जीवन के दौरान अंतहीन भेद और मूल्य निर्णय लिए जाने हैं। हालाँकि, एक भक्त हर चीज में कृष्ण को और कृष्ण में सब कुछ देखता है, प्रभु की सेवा में विनम्र, सरल और आनंदित रहता है। वह विस्तृत धार्मिक समारोह नहीं करता है, न ही वह असामाजिक या अनैतिक बनता है। भक्त केवल कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करता है और आसानी से जीवन की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर लेता है। साधारण व्यक्ति शारीरिक रखरखाव के लिए प्रयास करते हैं, लेकिन एक भक्त की प्रभु की दया से स्वचालित रूप से देखभाल होती है। भक्त के सामान्य व्यवहार और धार्मिक गतिविधियाँ भी सभी भगवान के व्यक्तित्व को समर्पित हैं; इस प्रकार एक भक्त के जीवन में कृष्ण के अलावा कुछ नहीं है। कृष्ण सभी सुरक्षा और रखरखाव देता है, और भक्त सब कुछ कृष्ण को देता है। इस स्वाभाविक मुक्त स्थिति को कृष्ण चेतना कहा जाता है। यह परम पूर्ण अच्छा है, जैसा कि प्रभु ने इस संपूर्ण कांड में समझाया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)