श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 38-40
 
 
श्लोक  11.21.38-40 
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात् ।
आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा ॥ ३८ ॥
छन्दोमयोऽमृतमय: सहस्रपदवीं प्रभु: ।
ओङ्काराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्त स्थभूषिताम् ॥ ३९ ॥
विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरै: ।
अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम् ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार एक मकड़ी अपने हृदय से जाला निकालकर मुँह से बाहर थूकती है, उसी प्रकार परम ईश्वर स्वयं को गूंजती हुई आदि प्राणवायु के रूप में प्रकट करते हैं। इस प्राणवायु में सभी पवित्र वैदिक छंद और अलौकिक आनंद भरा हुआ है। इस तरह भगवान अपने हृदय के आकाश से अपने मन के द्वारा महान और अनंत वैदिक ध्वनि का निर्माण करते हैं, जो स्पर्श जैसी विभिन्न प्रकार की ध्वनियों को जन्म देती है। यह वैदिक ध्वनि हज़ारों दिशाओं में फैलती है और ॐकार शब्द से विस्तारित विभिन्न अक्षरों से सुशोभित होती है - जैसे व्यंजन, स्वर, उष्म और अंतस्थ। तत्पश्चात अनेक मौखिक भेदों से वेद का विस्तार होता है और विभिन्न छंदों में अभिव्यक्ति होती है जिनमें प्रत्येक छंद पिछले वाले से चार अक्षर अधिक होता है। अंत में भगवान वैदिक ध्वनि के अपने स्वरूप को अपने ही भीतर समेट लेते हैं।
 
Just as a spider pulls out its web from its heart and spits it out through the mouth, so the Lord manifests Himself as the resounding primal breath of life. This breath of life is filled with all the sacred Vedic rhythms and transcendental bliss. Thus the Lord produces through His mind from the sky of His heart the great and infinite Vedic sound, which gives rise to various kinds of sounds like touch. This Vedic sound bursts forth in thousands of directions and is adorned with various syllables extended from the syllable Om-kara--such as consonants, vowels, uṣm and anastastha. Thereafter the Veda is expanded by various verbal variations and expressed in various rhythms, each rhythm having four syllables more than the previous one. Finally the Lord withdraws His form of Vedic sound within Himself.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामीजी ने इन तीन श्लोकों का एक विस्तृत तकनीकी विवरण दिया है, जिसकी समझ के लिए संस्कृत भाषा का व्यापक भाषाई ज्ञान होना आवश्यक है। मुख्य बिंदु यह है कि पारलौकिक ज्ञान वैदिक ध्वनि कंपन के माध्यम से व्यक्त किया जाता है, जो कि स्वयं परम सत्य, भगवान का प्रकटीकरण है। वैदिक ध्वनि सर्वोच्च भगवान से निकलती है और उसकी महिमा करने और उसे समझने के लिए उसे कंपित किया जाता है। सभी वैदिक ध्वनि कंपन का निष्कर्ष भगवद-गीता में मिलता है, जिसमें भगवान कहते हैं, वेदैंश्च सर्वैर अहं एव वेद्यः: सभी वैदिक ज्ञान का अर्थ केवल हमें ईश्वर को जानना और प्यार करना सिखाना है। जो व्यक्ति हमेशा भगवान कृष्ण के बारे में सोचता है, जो भगवान का भक्त बन जाता है और जो उनके पवित्र नाम का जाप करते हुए आस्था और भक्ति के साथ भगवान को नमन करता है और उनकी पूजा करता है, निश्चित रूप से उसे वेद ("ज्ञान") शब्द द्वारा इंगित की गई हर चीज की एक उत्तम समझ प्राप्त हुई है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)