श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  11.21.37 
मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना ।
भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
मैं सभी प्राणियों के भीतर रहनेवाला अनंत, अपरिवर्तनीय और सर्वशक्तिमान ईश्वरीय व्यक्तित्व हूँ। मैं सभी प्राणियों के भीतर वैदिक ध्वनि को ऊँकार के रूप में स्थापित करता हूँ। यह सूक्ष्म रूप से अनुभव की जाती है, ठीक उसी तरह जैसे कमल के डंठल पर एक तंतु।
 
I, residing within all beings as the infinite, unchangeable and omnipotent Lord, establish the Vedic sound in the form of Omkar within all beings. It is experienced as subtle as a strand of a lotus stem.
तात्पर्य
भगवान का परम व्यक्तित्व स्वयं प्रत्येक जीवित प्राणी के हृदय में निवास करता है, और इस श्लोक से हम समझ सकते हैं कि सभी वैदिक ज्ञान का बीज भी सभी जीवित प्राणियों के भीतर स्थित है। इस प्रकार, वैदिक ज्ञान को जागृत करने की प्रक्रिया, और इस प्रकार भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को जगाने की प्रक्रिया, सभी के लिए स्वाभाविक और आवश्यक है। सभी पूर्णताएँ जीवित प्राणी के हृदय में पाई जाती हैं; जैसे ही हृदय भगवान के पवित्र नामों का जाप करने से शुद्ध होता है, वह पूर्णता, कृष्ण भावना, तुरंत जाग जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)