श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  11.21.35 
वेदा ब्रह्मात्मविषयास्‍त्रिकाण्डविषया इमे ।
परोक्षवादा ऋषय: परोक्षं मम च प्रियम् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
वेद, तीन खण्डों में विभाजित, अंततः यह बताते हैं कि जीव ही शुद्ध आत्मा है। किन्तु वैदिक ऋषि-मुनि और मंत्र गुप्त रूप से ही यह बताते हैं और मैं भी ऐसे गुह्य वर्णनों से प्रसन्न होता हूँ।
 
The Vedas having three parts ultimately tell that the living being is the pure soul. But the Vedic sages and the mantras tell it in a secret manner and I too am pleased with such secret descriptions.
तात्पर्य
पिछले श्लोकों में भगवान कृष्ण ने इस संकल्पना का खंडन किया था कि वैदिक ज्ञान भौतिक सुख के लिए है, और यहाँ भगवान वैदिक साहित्य के वास्तविक उद्देश्य को संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं: आत्म-साक्षात्कार। यद्यपि सशर्त आत्माएँ भौतिक ऊर्जा के नेटवर्क में संघर्ष कर रही हैं, उनका वास्तविक अस्तित्व ईश्वर के राज्य में दिव्य स्वतंत्रता है। वेद धीरे-धीरे सशर्त आत्मा को भ्रम के अंधकार से बाहर निकालता है और उसे भगवान की शाश्वत प्रेमपूर्ण सेवा में स्थापित करता है। जैसा कि वेदांत-सूत्र (4.4.22) में कहा गया है, अनावृत्तिः शब्दात: "जो वैदिक ज्ञान को ठीक से सुनता है उसे जन्म और मृत्यु के चक्र में वापस नहीं लौटना पड़ता है।"

कोई पूछ सकता है कि स्वयं भगवान और भगवान के प्रतिनिधि, वैदिक ऋषि व मंत्र, गूढ़ या अप्रत्यक्ष शब्दों में क्यों बोलते हैं। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता में कहा है, नाहाम् प्रकाश सर्वस्य: परमेश्वर स्वयं को तुच्छ नहीं होने देते हैं, और इसलिए वे सतही या शत्रुतापूर्ण लोगों के लिए प्रकट नहीं होते हैं। जो भौतिक वातावरण से प्रदूषित हैं उन्हें वैदिक अनुष्ठानों के माध्यम से खुद को शुद्ध करने के लिए प्रेरित किया जाता है जो फलदायी परिणाम देते हैं, जैसे कि एक बच्चे को कैंडी इनाम देने की पेशकश करके दवा लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। वैदिक प्रदर्शनी की गोपनीय प्रकृति के कारण, कम बुद्धिमान व्यक्ति वेदों के अंतिम दिव्य उद्देश्य की सराहना नहीं कर सकते हैं, और फलस्वरूप वे इंद्रिय तृप्ति के स्तर तक गिर जाते हैं।

ब्रह्मात्म ("आध्यात्मिक आत्मा") शब्द अंततः भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को दर्शाता है, जो भगवद-गीता में कहते हैं कि उनका ज्ञान राज- गुह्यम है, सभी रहस्यों में सबसे गोपनीय। जो भौतिक इंद्रिय बोध पर निर्भर करता है वह परम सत्य की घोर अज्ञानता में रहता है। जो मानसिक और बौद्धिक अटकलों पर निर्भर करता है, उसे एक सुराग मिल सकता है कि शाश्वत आत्मा और परमात्मा दोनों भौतिक शरीर के भीतर हैं। लेकिन जो भगवान पर भगवद-गीता में भगवान के स्वयं के संदेश को विश्वासपूर्वक सुनकर, पूरी स्थिति को पूरी तरह से समझता है और वैदिक ज्ञान के वास्तविक उद्देश्य को पूरा करते हुए, भगवान के पास, घर वापस चला जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)