कोई पूछ सकता है कि स्वयं भगवान और भगवान के प्रतिनिधि, वैदिक ऋषि व मंत्र, गूढ़ या अप्रत्यक्ष शब्दों में क्यों बोलते हैं। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता में कहा है, नाहाम् प्रकाश सर्वस्य: परमेश्वर स्वयं को तुच्छ नहीं होने देते हैं, और इसलिए वे सतही या शत्रुतापूर्ण लोगों के लिए प्रकट नहीं होते हैं। जो भौतिक वातावरण से प्रदूषित हैं उन्हें वैदिक अनुष्ठानों के माध्यम से खुद को शुद्ध करने के लिए प्रेरित किया जाता है जो फलदायी परिणाम देते हैं, जैसे कि एक बच्चे को कैंडी इनाम देने की पेशकश करके दवा लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। वैदिक प्रदर्शनी की गोपनीय प्रकृति के कारण, कम बुद्धिमान व्यक्ति वेदों के अंतिम दिव्य उद्देश्य की सराहना नहीं कर सकते हैं, और फलस्वरूप वे इंद्रिय तृप्ति के स्तर तक गिर जाते हैं।
ब्रह्मात्म ("आध्यात्मिक आत्मा") शब्द अंततः भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को दर्शाता है, जो भगवद-गीता में कहते हैं कि उनका ज्ञान राज- गुह्यम है, सभी रहस्यों में सबसे गोपनीय। जो भौतिक इंद्रिय बोध पर निर्भर करता है वह परम सत्य की घोर अज्ञानता में रहता है। जो मानसिक और बौद्धिक अटकलों पर निर्भर करता है, उसे एक सुराग मिल सकता है कि शाश्वत आत्मा और परमात्मा दोनों भौतिक शरीर के भीतर हैं। लेकिन जो भगवान पर भगवद-गीता में भगवान के स्वयं के संदेश को विश्वासपूर्वक सुनकर, पूरी स्थिति को पूरी तरह से समझता है और वैदिक ज्ञान के वास्तविक उद्देश्य को पूरा करते हुए, भगवान के पास, घर वापस चला जाता है।
