रजोगुण, सतोगुण और तमोगुण में लिप्त लोग इन्द्र आदि देवताओं और अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, जो उन्हीं गुणों को प्रकट करते हैं। परन्तु, वे मेरी सही तरीके से आराधना करने में असमर्थ रहते हैं।
Those situated in the modes of Rajo, Satva and Tamo worship special demigods like Indra and other idols, who manifest the same modes of Rajo, Satva or Tamo, but they fail to worship Me properly.
तात्पर्य
यद्यपि उपदेवताएँ भगवान के अभिन्न अंग हैं, उपदेवता उपासना झूठे विचार को बढ़ावा देती है कि उपदेवता परम प्रभु से अलग मौजूद हैं। ऐसी उपासना अविधि-पूर्वकम है, या परम सत्य के लिए एक अनुचित दृष्टिकोण है। श्रील माधवाचार्य ने हरिवंश से उद्धृत किया है कि मुख्य रूप से अज्ञान के गुण में आने वालों में कभी-कभी जुनून और भलाई की अभिव्यक्तियाँ होती हैं। अच्छाई की ओर रुझान रखने वाले अज्ञानी व्यक्ति नरक में जा सकते हैं लेकिन उन्हें थोड़े स्वर्गीय सुख की भी अनुमति है। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि दयनीय वित्तीय या राजनीतिक परिस्थितियों में पीड़ित व्यक्ति कभी-कभी एक सुंदर पत्नी की संगति का आनंद लेता है, हालांकि उसकी सामान्य स्थिति नारकीय होती है। अज्ञान में जो लोग जुनून के साथ थोड़ा मिलाया जाता है, वे बस नरक में जाते हैं, और जो लोग पूरी तरह से अज्ञान के गुण में हैं वे नरक के सबसे अंधेरे क्षेत्र में चले जाते हैं। परम प्रभु के प्रति भक्ति से रहित लोग इन तीनों श्रेणियों में अज्ञान में हैं। कभी-कभी सद्गुण के गुण में स्थित व्यक्ति परम प्रभु के सर्वोच्चता को स्वीकार करते हैं, लेकिन उपदेवताओं के प्रति अधिक आकर्षित होते हैं, यह मानते हुए कि वैदिक अनुष्ठानों के माध्यम से वे उपदेवताओं के समान स्तर का जीवन प्राप्त कर सकते हैं। यह घमंडी प्रवृत्ति निश्चित रूप से परम प्रभु की प्रेममयी सेवा में बाधा है और अंततः पतन का कारण बनती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥