श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  11.21.3 
शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु ।
द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ ।
धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप उद्धव, जीवन में क्या उचित है यह जानने के लिए, मनुष्य को किसी एक-एक वस्तु का मूल्यांकन उसके खास प्रकृति के आधार पर करना चाहिए। इस प्रकार, धार्मिक सिद्धांतों का विश्लेषण करते समय मनुष्य को शुद्धता और अपवित्रता पर विचार करना चाहिए। इसी तरह, अपने सामान्य व्यवहार में मनुष्य को अच्छे और बुरे के बीच अंतर करना चाहिए और अपनी शारीरिक उत्तरजीविता को सुनिश्चित करने के लिए उसे शुभ और अशुभ को पहचानना चाहिए।
 
O sinless Uddhava, to understand what is right in life, one must evaluate a thing within its own category. Thus, while analyzing Dharma, one must consider purity and impurity. Similarly, in his ordinary conduct, one must distinguish between good and evil, and for his bodily longevity (atijivana), he must recognize what is auspicious and what is inauspicious.
तात्पर्य
धार्मिक गतिविधियों, साधारण व्यवहार एवं व्यक्तिगत अस्तित्व में मूल्य निर्णयों से बचा नहीं जा सकता। नैतिकता और धर्म सभ्य समाज में चिरस्थायी आवश्यकताएँ हैं; इसलिए पवित्रता एवं अपवित्रता, धार्मिकता एवं अधार्मिकता, नैतिकता एवं अनैतिकता में भेद करना किसी न किसी तरह निश्चित किया ही जाना चाहिए। इसी तरह, अपनी साधारण, सांसारिक गतिविधियों में हम स्वादिष्ट और बेस्वाद भोजन, अच्छे और बुरे व्यापार के बीच में भेद करते हैं, उच्च श्रेणी और निम्न श्रेणी के आवासों, अच्छे और बुरे मित्रों और इसी तरह के अन्य भेद करते हैं। और अपने शारीरिक स्वास्थ्य और अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए, हम लगातार सुरक्षित एवं असुरक्षित, स्वस्थ एवं अस्वस्थ, लाभदायक एवं अलाभदायक में भेद करते रहते हैं। यहाँ तक कि एक विद्वान व्यक्ति को भी लगातार भौतिक संसार में अच्छे और बुरे के बीच भेद करना चाहिए, लेकिन साथ ही उसे कृष्ण चेतना की पारलौकिक स्थिति को समझना चाहिए। भौतिक रूप से स्वस्थ या अस्वस्थ का सावधानीपूर्वक गणना करने के बावजूद, भौतिक शरीर नष्ट हो जाएगा और मर जाएगा। सामाजिक रूप से अनुकूल और प्रतिकूल की सावधानीपूर्वक छानबीन के बावजूद, समय बीतने के साथ किसी का पूरा सामाजिक वातावरण गायब हो जाएगा। उसी तरह, इतिहास के दौरान महान धर्म उभरते हैं और गायब हो जाते हैं। इस प्रकार मात्र धार्मिकता, सामाजिक और वित्तीय विशेषज्ञता या शारीरिक फिटनेस जीवन की वास्तविक पूर्णता प्रदान नहीं कर सकते। भौतिक संसार की सापेक्ष अच्छाई से परे एक पारलौकिक अच्छाई है। कोई भी समझदार व्यक्ति भौतिक भेदभाव की व्यावहारिक और तात्कालिक आवश्यकता को स्वीकार करता है; फिर भी अंततः उसे कृष्ण चेतना की पारलौकिक अवस्था में आना चाहिए, जहाँ जीवन अनंत है, आनंद और ज्ञान से भरा हुआ है। श्री उद्धव को अपनी विस्तृत शिक्षाओं में भगवान कृष्ण, भौतिक अच्छाई और बुराई की अंतहीन विविधता से परे कृष्ण चेतना की पारलौकिक स्थिति को धीरे-धीरे स्पष्ट कर रहे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)