न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यत: ।
उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुष: ॥ २८ ॥
अनुवाद
हे उद्धव, वैदिक अनुष्ठानों में संलग्न होकर इन्द्रिय तृप्ति में लिप्त लोग यह नहीं समझ सकते कि मैं हर एक के हृदय में स्थित हूँ और समस्त ब्रह्मांड मुझसे भिन्न नहीं है और मुझी से उत्पन्न हुआ है। निस्संदेह, ऐसे लोग वे हैं जिनकी आँखें कुहरे से ढँकी हुई हैं।
O Uddhava, those devoted to sense-gratification derived from respecting Vedic rituals cannot understand that I am situated in everyone's heart and that the entire universe is not non-different from Me and has emanated from Me. Indeed, they are like persons whose eyes are covered with mist.
तात्पर्य
उक्थ-शास्त्राः शब्द कुछ वैदिक मंत्रो के जाप को इंगित करता है, जिससे इस और अगले जन्म में फलदायक परिणाम पाए जाते हैं। शास्त्र शब्द एक हथियार को भी इंगित करता है, और इसलिए उक्थ-शास्त्र का अर्थ बलिदान में इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार भी है, जिससे बलि के लिए चुने गए पशु को मारा जाता है। भौतिक सुख के लिए वैदिक ज्ञान का दोहन करने वाले लोग भौतिकवादी धार्मिक सिद्धांतों के हथियार से खुद को मार रहे हैं। उनकी तुलना घने कोहरे में देखने की कोशिश करने वालों से भी की जाती है। जीवन की भ्रामक भौतिक अवधारणा, जिसमें व्यक्ति शरीर के भीतर मौजूद शाश्वत आत्मा की अनदेखी करता है, अज्ञानता का एक घना कोहरा है जो भगवान की हमारी दृष्टि को अवरुद्ध करता है। इसलिए भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता में अपने निर्देश की शुरुआत जीवन की भौतिक अवधारणा की घनी अज्ञानता को दूर करके की है। धर्म का अर्थ है ईश्वर का नियम। भगवान का अंतिम आदेश, या नियम, यह है कि प्रत्येक बद्ध आत्मा उसे आत्मसमर्पण करे, उसकी सेवा और प्रेम करना सीखे और इस प्रकार घर वापस, भगवान के पास लौट जाए। यही कृष्ण चेतना की प्रक्रिया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥