एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धय: ।
फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि ॥ २६ ॥
अनुवाद
विकृत बुद्धि वाले लोग वैदिक ज्ञान के वास्तविक उद्देश्य को समझ नहीं पाते और फलस्वरूप, वेदों के अलंकारमय बयानों को परम वैदिक सत्य कहते हैं। ये कथन भौतिक पुरस्कारों का वादा करते हैं, लेकिन वेदों के सच्चे जानकार कभी भी इस तरह की बातें नहीं करते।
People with perverted minds do not understand this real purpose of Vedic knowledge, but instead they propagate the rhetorical statements of the Vedas promising fruits as the ultimate Vedic truth. But those who are truly knowledgeable of the Vedas never speak like this.
तात्पर्य
कर्म-मीमांसा फिलॉस्फी के अनुयायी घोषणा करते हैं कि इस ब्रह्मांड के परे परमात्मा का कोई शाश्वत राज्य नहीं है और इसलिए स्वयं को एक भौतिक स्वर्गीय ग्रह में रखने के लिए किसी को वैदिक अनुष्ठानों का एक पेशेवर कलाकार बन जाना चाहिए। जैसा कि भगवान द्वारा पिछले अध्याय में श्री उद्धव को समझाया गया है, भौतिक दुनिया में कोई वास्तविक खुशी नहीं है, क्योंकि स्वर्ग से नरक तक फैले विभिन्न ग्रहों के वातावरण में अनिवार्य रूप से घूमेंगे और इस प्रकार हमेशा भौतिक वातावरण में परेशान रहेंगे। हालांकि डॉक्टर एक बच्चे को कैंडी से ढकी दवा दे सकता है, लेकिन जो बच्चे को कैंडी खाने और दवा को फेंकने का आग्रह करता है वह निश्चित रूप से एक महान मूर्ख है। इसी तरह, स्वर्गीय आनंद का वर्णन करने वाले वेदों के फूलों के बयान वैदिक ज्ञान का वास्तविक फल नहीं देते हैं, लेकिन केवल संवेदी संतुष्टि के सजावटी फूलों की आपूर्ति करते हैं। जैसा कि वेदों (ऋग्वेद 1.22.20) में कहा गया है, तद विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूर्यः। देवता भी, जो स्वर्ग के स्थायी निवासी हैं, हमेशा सर्वोच्च भगवान के शाश्वत निवास की ओर देखते हैं। भौतिक स्वर्ग में जीवन स्तर की प्रशंसा करने वाले मूर्ख लोगों को इसलिए ध्यान रखना चाहिए कि देवता स्वयं ही सर्वोच्च भगवान के भक्त हैं। किसी को तथाकथित वैदिक ज्ञान का एक फर्जी प्रचारक नहीं बनना चाहिए, बल्कि कृष्ण चेतना लेना चाहिए और जीवन में प्रगति की समस्या का एक वास्तविक समाधान करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥