न तानविदुष: स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि ।
कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुध: ॥ २५ ॥
अनुवाद
जो लोग अपने वास्तविक स्वार्थ से अनभिज्ञ हैं, वे भौतिक अस्तित्व के मार्ग पर भटक रहे हैं और धीरे-धीरे अंधकार की ओर बढ़ रहे हैं। भला वेद उन्हें और अधिक इंद्रिय तृप्ति के प्रति क्यों प्रोत्साहित करने लगे यदि वे मूर्खजन विनम्र भाव से वैदिक आदेशों पर ध्यान दें।
Unaware of their own selfishness, people are wandering in the path of the material world and slowly moving towards darkness. Why should the Vedas encourage them towards more sense gratification if those foolish people pay heed to the Vedic injunctions with humility?
तात्पर्य
भौतिकवादी व्यक्ति, समाज, दोस्ती और प्रेम को त्यागने के लिए तैयार नहीं होते हैं, जो सभी कामुक भोगों पर आधारित हैं, वे त्याग और आत्म-साक्षात्कार के जीवन में प्रवेश करने के लिए हैं। ऐसे मूर्ख व्यक्तियों को वैदिक आज्ञाओं के दायरे में लाने के लिए, वेद उन लोगों को असंख्य भौतिक पुरस्कारों और स्वर्ग के ग्रहों पर पदोन्नति देने का वादा करते हैं, जो वैदिक आज्ञाओं को ईमानदारी से निभाते हैं। जैसा कि भगवान ने समझाया है कि ऐसे पुरस्कार एक बच्चे को दी गई कैंडी की तरह हैं, जो फिर ईमानदारी से अपनी दवा लेता है। भौतिक भोग निश्चित रूप से दुख का कारण है, क्योंकि सभी भोग्य वस्तुएं कथित उपभोक्ता के साथ-साथ नष्ट हो जाती हैं। भौतिक जीवन कष्टदायी है और चिंता, निराशा और विलाप से भरा है। हम एक कथित भोग्य वस्तु को देखकर उत्तेजित हो जाते हैं, जैसे किसी स्त्री का नग्न शरीर, एक सुंदर आवास, भोजन की एक शानदार थाली या अपनी प्रतिष्ठा का विस्तार, लेकिन वास्तव में ऐसी कल्पित खुशी कभी न आने वाली संतुष्टि की गहन अपेक्षा है। भौतिक अस्तित्व में व्यक्ति निरंतर निराश रहता है, और जितना अधिक वह भोगने की कोशिश करता है, उतना ही उसकी निराशा बढ़ती जाती है। इसलिए, वैदिक ज्ञान, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक मंच पर अंतिम शांति और खुशी है, वह कभी भी भौतिकवादी जीवन शैली को अधिकृत नहीं कर सकता है। भौतिक पुरस्कारों को वेदों द्वारा केवल अनुकूलित आत्मा के लिए दवा लेने के लिए प्रोत्साहन के रूप में नियोजित किया जाता है, विभिन्न प्रकार के बलिदान के माध्यम से सर्वोच्च भगवान, विष्णु के प्रति समर्पण। वेद-वाद-रत लोग दावा करते हैं कि धार्मिक ग्रंथों का उद्देश्य जीवन की स्थिति में अज्ञानता में इंद्रिय संतुष्टि की सुविधा प्रदान करना है। हालाँकि, धर्म का सच्चा लक्ष्य आध्यात्मिक मुक्ति है, जिसमें भौतिक इंद्रिय संतुष्टि का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान की प्रकाशमय ज्योति में शारीरिक आसक्ति का अंधकार नहीं रह सकता। आध्यात्मिक आनंद के सागर में, इस दुनिया के चिंताग्रस्त स्पष्ट सुख पूरी तरह से गायब हो जाते हैं। वेद, या पूर्ण ज्ञान का वास्तविक अर्थ, भगवान की पूर्ण कृष्ण चेतना में आनंद और ज्ञान के अनंत जीवन के लिए भगवान के वफादार सेवक के रूप में सर्वोच्च भगवान के प्रति समर्पण करना है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥