उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च ।
आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु ॥ २४ ॥
अनुवाद
ईश्वर की कृपा से ही मानव जन्म प्राप्त होता है लेकिन मनुष्य इन्द्रिय सुख, दीर्घायु, इन्द्रियों से सम्बन्धित कर्म, शक्ति, कामुकता तथा मित्रों और परिवार के प्रति मोहग्रस्त हो जाते हैं। इस प्रकार उनका मन ऐसी बातों में आसक्त हो जाता है जिससे उनके वास्तविक हितों को ठेस पहुँचती है |
From the moment of birth, all human beings become attached in their minds to sense gratification, longevity, sense-action, strength, sexual power, and friends and family. Thus their minds are absorbed in such matters which hurt their real self-interest.
तात्पर्य
भौतिक शरीर और परिवार तथा मित्रों के शरीरों के प्रति हमारा मोह अनिवार्य रूप से असहनीय चिंता और पीड़ा की ओर ले जाता है। जीवन की शारीरिक अवधारणा में लीन मन स्वयं की प्राप्ति में कभी आगे नहीं बढ़ सकता और इसलिए किसी के अनन्त आनंद और ज्ञान के जीवन की आशा उसके तथाकथित प्रेम की वस्तुओं से ही पराजित हो जाती है। अज्ञान में किये गये कर्म न तो स्वयं के लिए न ही दूसरों के लिए लाभकारी होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे दान कार्य जो कोई सपने में करता है वास्तविक लोगों को कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं पहुँचाता। शर्तबद्ध आत्मा भगवान से अलग एक दुनिया के बारे में सपना देख रही है, पर इस सपनों की दुनिया में अनुभव की गयी कोई भी उन्नति केवल भ्रम है। भगवान ने भगवद-गीता में कहा है, सर्व-लोका-महेस्वरम्: वे सभी ग्रहों और लोकों के सर्वोच्च भोक्ता और स्वामी हैं। केवल कृष्ण चेतना, भगवान की सर्वोच्चता की पहचान द्वारा ही कोई जीवन में वास्तविक प्रगति कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥