श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  11.21.23 
फलश्रुतिरियं नृणां न श्रेयो रोचनं परम् ।
श्रेयोविवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
जिन श्रुति शास्त्रों में फल के लिए प्रलोभन दिया जाता है, वे मनुष्य के परम कल्याण की प्राप्ति का उपदेश नहीं करते, बल्कि वे मनुष्य को लाभदायक धार्मिक कर्म करने के लिए उकासते हैं, जिस प्रकार एक बच्चे को लाभदायक दवा पिलाने के लिए उसे कैंडी का वादा किया जाता है।
 
The words of the Shruti which promise rewards are not recommendations for the ultimate welfare of human beings, but are merely inducements to perform beneficial religious acts, just as sugar candy is promised to a child to entice him to drink beneficial medicine.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में भगवान कृष्ण ने कहा कि इन्द्रिय तृप्ति में लिप्त लोग निश्चित रूप से मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य से भटक जाते हैं। लेकिन जब वेद स्वयं यज्ञ और तपस्या के परिणामस्वरूप स्वर्ग में इन्द्रिय तृप्ति का वादा करते हैं, तो स्वर्ग में पदोन्नति को जीवन के लक्ष्य से विचलन कैसे माना जा सकता है? भगवान यहाँ बताते हैं कि धार्मिक ग्रंथों में दिए गए भोगवादी पुरस्कार केवल प्रलोभन मात्र हैं, जैसे कैंडी जिसका उपयोग किसी बच्चे को दवा लेने के लिए प्रेरित करने के लिए किया जाता है। वास्तव में यह दवा ही फायदेमंद होती है, कैंडी नहीं। इसी तरह, भोगवादी यज्ञों में भगवान विष्णु की पूजा ही फायदेमंद होती है, न कि भोगवादी पुरस्कार स्वयं। भगवद्गीता के अनुसार, जो लोग धार्मिक ग्रंथों का अंतिम लक्ष्य भोगवादी पुरस्कारों को मानते हैं, वे निश्चित रूप से कम बुद्धिमान मूर्ख हैं जो भगवान के उद्देश्य के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। भगवान चाहते हैं कि सभी बद्ध आत्माएँ शुद्ध हों और आनंद और ज्ञान के शाश्वत जीवन के लिए वापस भगवान के पास लौट आएँ। जो लोग धार्मिकता के नाम पर भगवान के उद्देश्य का विरोध करते हैं, वे निश्चित रूप से जीवन के उद्देश्य के बारे में भ्रमित हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)