इन्द्रियतृप्ति में लीन रहने के कारण मनुष्य स्वयं या दूसरों को भी पहचान नहीं पाता। वह वृक्ष की तरह अज्ञानता में व्यर्थ ही जीवन बिताता रहता है और धौंकनी की भाँति केवल साँस ही लेता रहता है।
Being absorbed in sense gratification, man is unable to recognize himself or others. Like a tree, he lives in ignorance and keeps breathing like a bellows.
तात्पर्य
जैसे पेड़ जिसके खुद को बचाने का कोई जरिया नहीं है, निरंतर काटे जाते रहते हैं, उसी तरह, कंडीशन आत्माओं को प्रकृति के क्रूर नियमों द्वारा निरंतर प्रताड़ित किया जाता है, जो असंख्य कठिनाइयों को थोपते हैं जिसका अंत अकस्मात मृत्यु होता है। यद्यपि मूर्ख लोग यह सोचते हैं कि वे स्वयं और अन्य की सहायता कर रहे हैं, परंतु वास्तव में वे अपनी पहचान नहीं जानते, न ही अपने तथाकथित मित्रों और रिश्तेदारों की पहचान जानते हैं। बाहरी शरीर की इंद्रियों को संतुष्ट करने में लीन होकर, वे अपना जीवन व्यर्थ ही व्यतीत करते हैं, आध्यात्मिक लाभ के बिना। यह व्यर्थ जीवनशैली को पूर्ण जीवन में केवल भगवान के पवित्र नामों का कीर्तन करके बदला जा सकता है कृष्ण चेतना में, जैसे कि श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा अनुशंसित किया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥