श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  11.21.20 
कलेर्दुर्विषह: क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते ।
तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी द्रुतम् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
कलह से असहनीय क्रोध उत्पन्न होता है, उसके बाद अज्ञानता का अंधकार छा जाता है। यह अज्ञानता मनुष्य की विस्तृत बुद्धि पर तुरंत हावी हो जाती है।
 
Discord gives rise to unbearable anger and from that arises the darkness of ignorance. This ignorance immediately overpowers the vast consciousness of man.
तात्पर्य
भौतिक सम्बन्ध की इच्छा इस प्रवृत्ति से जन्म लेती है जिससे यह अस्वीकार किया जाता है कि प्रत्येक वस्तु ईश्वर की ऊर्जा है। गलत तरीके से भौतिक संवेदनाओं को सर्वोच्च ईश्वर से अलग मानकर उनकी इच्छा की जाती है; ऐसी इच्छा से मानव समाज में झगड़ा और विवाद होता है। यह विवाद अनिवार्य रूप से महान रोष को जन्म देता है जिससे मानव मूर्ख और विनाशकारी हो जाता है। इस प्रकार मानव जीवन का वास्तविक लक्ष्य शीघ्रता से भूल जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)