अध्याय उन्नीस, पद ४५ में, भगवान कृष्ण कहते हैं, गुणदोषा दृशिष दोषो गुणस्तुभयवरर्जितः। भक्त में तब भौतिक अच्छाई और बुराई नहीं देखनी चाहिए। यकीनन, ऐसी सांसारिक धारणाओं को छोड़ कर व्यक्ति पवित्र हो जाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि कभी कभार, एक नया भक्त, फलीभूत गतिविधियों और मानसिक अनुमानों को अत्यधिक करते हुए, संसर्ग से मैला हो सकता है। ऐसे भक्त की धार्मिक गतिविधियाँ, सांसारिक प्रवृत्तियों से प्रभावित हो सकती हैं। इसी तरह, एक साधारण व्यक्ति जो एक शुद्ध भक्त की उन्नत स्थिति को देखता है, कभी-कभी भक्त की गतिविधियों का बाहरी अनुकरण करता है, यह मानते हुए कि वह शुद्ध भक्ति-योग के उसी ऊँचे स्तर पर है। भक्ति-योग के ये अपूर्ण अभ्यासी आलोचना से मुक्त नहीं हैं, क्योंकि उनकी फलीभूत गतिविधियाँ, मानसिक अनुमान और झूठा प्रतिष्ठा, भगवान की शुद्ध प्रेमपूर्ण सेवा में भौतिक घुसपैठियाँ हैं। भगवान की सेवा में विशेष रूप से समर्पित एक शुद्ध भक्त की आलोचना नहीं की जानी चाहिए, लेकिन एक भक्त की जिसकी भक्ति सेवा भौतिक गुणों के साथ मिश्रित है, उसे ठीक किया जा सकता है ताकि वह शुद्ध भक्ति सेवा के स्तर तक उठ सके। निर्दोष व्यक्तियों को उन लोगों की मिश्रित भक्ति सेवा से भ्रमित नहीं होना चाहिए जो विशेष रूप से भक्ति-योग प्रणाली में समर्पित नहीं हैं, लेकिन जो कृष्ण चेतना में पूरी तरह से शामिल होने में असमर्थ हैं उन्हें अपनी नियमित निर्धारित जिम्मेदारियों को नहीं छोड़ देना चाहिए, उन्हें माया घोषित करना चाहिए। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति जो शुद्ध कृष्ण चेतना में पूरी तरह से शामिल नहीं हो सकता है उसे अपने परिवार को नहीं छोड़ना चाहिए, यह मानते हुए कि यह एक भ्रम है, ऐसा करने से वह अवैध यौन जीवन में गिर जाएगा। भौतिक धार्मिकता और भौतिक संसार का विश्लेषणात्मक ज्ञान तब तक विकसित किया जाना चाहिए जब तक कि व्यक्ति कृष्ण चेतना का सीधे अभ्यास करने के स्तर पर न आ जाए।
