श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  11.21.2 
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुण: परिकीर्तित: ।
विपर्ययस्तु दोष: स्यादुभयोरेष निश्चय: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
अपने पद पर स्थिरता रखना असल शुद्धता है, वहीं अपने पद से हटना अशुद्धता है। इस प्रकार दोनों को निश्चित किया जाता है।
 
Stability at one's position is called actual purity and deviation from one's position is impurity. In this way both are determined.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में भगवान कृष्ण ने समझाया कि आत्मिक प्रगति का मार्ग बिना कामनाओं के कर्म करने से शुरू होता है, आत्मिक ज्ञान की स्थिति तक पहुँचता है और प्रभु की भक्तिमय सेवा में सीधे तौर पर जुड़ने में समाप्त होता है। यहाँ प्रभु ज़ोर देकर कहते हैं कि शर्तों पर निर्भर आत्मा को अपनी कृष्णभावना के स्वाभाविक विकास को कृत्रिम रूप से नहीं रोकना चाहिए, प्रभु द्वारा खुद बताए गए कर्तव्यों से भटककर। मानव जीवन के निचले सोपानों में व्यक्ति भौतिक शरीर के साथ झूठी पहचान में उलझा रहता है और समाज, दोस्ती और प्यार के आधार पर भौतिक इच्छाओं को पूर्ण करने वाले कर्म करना चाहता है। जब इस तरह की भौतिकवादी गतिविधियों को परम प्रभु को चढ़ाया जाता है, तो व्यक्ति कर्म-योग में स्थापित हो जाता है। नियमित यज्ञ करने से धीरे-धीरे व्यक्ति जीवन की स्थूल शारीरिक अवधारणा को त्याग देता है और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के स्तर तक पहुँच जाता है, जिससे व्यक्ति खुद को एक अमर आध्यात्मिक आत्मा के रूप में समझता है जो भौतिक शरीर और मन से पूरी तरह से अलग है। भौतिकवाद की पीड़ा से राहत पाकर व्यक्ति अपने आध्यात्मिक ज्ञान से बहुत जुड़ जाता है, और इस तरह व्यक्ति ज्ञान-योग के चरण में स्थापित हो जाता है। जैसे-जैसे अभ्यर्थी आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ता है, तो वह खुद को परम आत्मा का एक अंश और परमात्मा भगवान कृष्ण का अंग समझता है। फिर वह देखता है कि उसका सशर्त जीवन और उसका आध्यात्मिक ज्ञान परमात्मा से ही प्राप्त हुआ था, जो सभी प्रकार की गतिविधियों के परिणाम देता है, दोनों पवित्र और पापपूर्ण। परम प्रभु की प्रेमपूर्ण सेवा में सीधे तौर पर जुड़कर और खुद को प्रभु का शाश्वत सेवक समझकर, व्यक्ति का लगाव परमात्मा के शुद्ध प्रेम में विकसित हो जाता है। इस तरह व्यक्ति पहले भौतिक शरीर के प्रति लगाव के निचले स्तर को त्याग देता है और फिर बाद में आध्यात्मिक ज्ञान की खेती करने के लगाव को त्याग देता है। यह व्यक्ति को भौतिक जीवन से मुक्ति दिलाता है। अंततः व्यक्ति प्रभु को खुद अपने शाश्वत प्रेम के विश्राम स्थल के रूप में पहचानता है और कृष्णभावना में पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पण करता है। भगवान कृष्ण इस श्लोक में समझाते हैं कि जो व्यक्ति अभी भी भौतिक शरीर और मन से जुड़ा हुआ है, वह कृत्रिम रूप से कर्म-योग के निर्धारित कर्तव्यों को नहीं छोड़ सकता। उसी तरह, जो व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से नौसिखिया है, भौतिक जीवन के भ्रम को समझना शुरू ही कर रहा है, उसे कृत्रिम रूप से प्रेम-भक्ति के स्तर का अनुकरण करते हुए, दिन में चौबीसों घंटे प्रभु के अंतरंग मनोरंजन के बारे में सोचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बल्कि, उसे भौतिक जगत के विश्लेषणात्मक ज्ञान की खेती करनी चाहिए, जिससे व्यक्ति भौतिक शरीर और मन के प्रति लगाव को त्याग देता है। श्रीमद-भागवतम में हमें भौतिक जगत के कई विश्लेषणात्मक वर्णन मिलते हैं, और वे शर्तों से बंधी आत्मा को पदार्थ के साथ झूठी पहचान से मुक्त कर सकते हैं। हालाँकि, जिसने ईश्वर के प्रति प्रेम की पूर्ण अवस्था प्राप्त कर ली है, वह भौतिक जगत के सभी स्थूल और सूक्ष्म लगावों से मुक्त होकर कर्म-योग और ज्ञान-योग के निचले स्तरों को त्याग सकता है और प्रभु की प्रेमपूर्ण सेवा में सीधे जुड़ सकता है।

अध्याय उन्नीस, पद ४५ में, भगवान कृष्ण कहते हैं, गुणदोषा दृशिष दोषो गुणस्तुभयवरर्जितः। भक्त में तब भौतिक अच्छाई और बुराई नहीं देखनी चाहिए। यकीनन, ऐसी सांसारिक धारणाओं को छोड़ कर व्यक्ति पवित्र हो जाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि कभी कभार, एक नया भक्त, फलीभूत गतिविधियों और मानसिक अनुमानों को अत्यधिक करते हुए, संसर्ग से मैला हो सकता है। ऐसे भक्त की धार्मिक गतिविधियाँ, सांसारिक प्रवृत्तियों से प्रभावित हो सकती हैं। इसी तरह, एक साधारण व्यक्ति जो एक शुद्ध भक्त की उन्नत स्थिति को देखता है, कभी-कभी भक्त की गतिविधियों का बाहरी अनुकरण करता है, यह मानते हुए कि वह शुद्ध भक्ति-योग के उसी ऊँचे स्तर पर है। भक्ति-योग के ये अपूर्ण अभ्यासी आलोचना से मुक्त नहीं हैं, क्योंकि उनकी फलीभूत गतिविधियाँ, मानसिक अनुमान और झूठा प्रतिष्ठा, भगवान की शुद्ध प्रेमपूर्ण सेवा में भौतिक घुसपैठियाँ हैं। भगवान की सेवा में विशेष रूप से समर्पित एक शुद्ध भक्त की आलोचना नहीं की जानी चाहिए, लेकिन एक भक्त की जिसकी भक्ति सेवा भौतिक गुणों के साथ मिश्रित है, उसे ठीक किया जा सकता है ताकि वह शुद्ध भक्ति सेवा के स्तर तक उठ सके। निर्दोष व्यक्तियों को उन लोगों की मिश्रित भक्ति सेवा से भ्रमित नहीं होना चाहिए जो विशेष रूप से भक्ति-योग प्रणाली में समर्पित नहीं हैं, लेकिन जो कृष्ण चेतना में पूरी तरह से शामिल होने में असमर्थ हैं उन्हें अपनी नियमित निर्धारित जिम्मेदारियों को नहीं छोड़ देना चाहिए, उन्हें माया घोषित करना चाहिए। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति जो शुद्ध कृष्ण चेतना में पूरी तरह से शामिल नहीं हो सकता है उसे अपने परिवार को नहीं छोड़ना चाहिए, यह मानते हुए कि यह एक भ्रम है, ऐसा करने से वह अवैध यौन जीवन में गिर जाएगा। भौतिक धार्मिकता और भौतिक संसार का विश्लेषणात्मक ज्ञान तब तक विकसित किया जाना चाहिए जब तक कि व्यक्ति कृष्ण चेतना का सीधे अभ्यास करने के स्तर पर न आ जाए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)