श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  11.21.18 
यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्तत: ।
एष धर्मो नृणां क्षेम: शोकमोहभयापह: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
किसी खास पापपूर्ण या भौतिक कार्य से दूर रहकर, व्यक्ति उसकी जकड़न से छूट जाता है। ऐसा त्याग इंसान के धार्मिक और मंगलमय जीवन की नींव है और यह सभी शोक, आकर्षण और डर को दूर रखता है।
 
By abstaining from any sinful or materialistic action, man becomes free from its bondage. Such renunciation is the foundation of a religious and benevolent life for men and it drives away all sorrow, attachment and fear.
तात्पर्य
चैतन्य-चरितामृत (अन्त्य 6.220) में कहा गया है:

महाप्रभुरा भक्ता-गणेरा वैराग्य प्रधान

याहा देखि' प्रीत हना गौर-भगवान

"वैराग्य श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों के जीवन को बनाए रखने वाला मूल सिद्धांत है। इस वैराग्य को देखकर, श्री चैतन्य महाप्रभु, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, अत्यंत संतुष्ट हैं।"

मिथ्या अहंकार के कारण व्यक्ति स्वयं को अपने कार्यों का स्वामी और उपभोक्ता समझता है। वास्तव में, भगवान कृष्ण, भगवान का व्यक्तित्व, हमारे कार्यों का स्वामी और उपभोक्ता है; कृष्ण चेतना में इस तथ्य को पहचानने से व्यक्ति को वास्तविक वैराग्य प्राप्त होता है। प्रत्येक मनुष्य को अपने निर्धारित कर्तव्य को सर्वोच्च प्रभु को भेंट के रूप में करना चाहिए। तब भौतिक उलझाव की कोई संभावना नहीं रहेगी। भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता में स्पष्ट रूप से समझाया है कि प्रभु को अर्पित किए गए निर्धारित कर्तव्य भौतिक बंधन से मुक्ति प्रदान करते हैं। पापपूर्ण गतिविधियों को प्रभु को अर्पित नहीं किया जा सकता है बल्कि उन्हें पूरी तरह से त्याग दिया जाना चाहिए। वास्तव में, पवित्रता और पाप के बीच का भेद इसलिए किया जाता है ताकि जीव पवित्र बने और सर्वोच्च प्रभु के प्रति समर्पण करने योग्य बने। जैसा कि भगवद-गीता (7.28) में बताया गया है:

येषां त्व अन्त-गतं पापं

जनानां पुण्य-कर्माणाम्

ते द्वंद्व-मोह-निर्मुक्ता

भजन्ते माम् दृढ़-व्रताः

“जो लोग पिछले जन्मों और इस जन्म में धर्मपूर्वक कार्य कर चुके हैं, जिनके पापपूर्ण कार्य पूरी तरह से मिट चुके हैं और जो द्वैत के भ्रम से मुक्त हैं, वे दृढ़ निश्चय के साथ मेरी सेवा में संलग्न होते हैं।”

पूरी पवित्रता से व्यक्ति का जीवन शुभ हो जाता है और विलाप, भ्रम और भय से मुक्त हो जाता है, और तब वह कृष्ण चेतना के मार्ग पर चल सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)