श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  11.21.16 
क्व‍‍चिद् गुणोऽपि दोष: स्याद् दोषोऽपि विधिना गुण: ।
गुणदोषार्थनियमस्तद्भ‍िदामेव बाधते ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
कभी धर्म पाप बन जाता है और कभी वैदिक आदेशों के कारण पाप धर्म बन जाता है। ऐसे विशेष नियमों से धर्म और पाप के बीच का अंतर मिट जाता है।
 
Sometimes virtue becomes sin and sometimes sin becomes virtue on the basis of Vedic injunctions. With such specific rules, the clear distinction between virtue and sin is erased.
तात्पर्य
प्रभु यहां स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि भौतिक पवित्रता और पाप हमेशा सापेक्ष विचार होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी पड़ोसी का घर आग से जल रहा है और कोई उसे आग से बचाने के लिए उसकी छत में छेद कर देता है, तो उसे उस खतरनाक स्थिति के कारण एक धर्मपरायण नायक माना जाता है। हालांकि, सामान्य परिस्थितियों में, यदि कोई अपने पड़ोसी की छत में छेद कर देता है या पड़ोसी की खिड़कियां तोड़ देता है, तो उसे एक अपराधी माना जाता है। इसी तरह, जो अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ देता है, वह निश्चित रूप से गैर-जिम्मेदार और विचारहीन होता है। हालांकि, अगर कोई सन्यास लेता है, और उच्च आध्यात्मिक मंच पर स्थिर रहता है, तो उसे सबसे संत व्यक्ति माना जाता है। इसलिए धर्मपरायणता और पाप विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं और कभी-कभी इन्हें अलग करना मुश्किल हो जाता है। श्रील माध्वाचार्य के अनुसार, चौदह वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति अच्छाई और बुराई के बीच अंतर करने में सक्षम माने जाते हैं और इस प्रकार वे अपने धर्मपरायण और पापी कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं। दूसरी ओर, अज्ञान में लीन पशुओं को उनके अपराधों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है या उनके तथाकथित अच्छे गुणों के लिए उनकी प्रशंसा नहीं की जा सकती है, जो अंततः सभी अज्ञानता से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य जो पशुओं की तरह कार्य करते हैं, इस विचार के साथ कि किसी को कोई अपराधबोध नहीं होना चाहिए, बल्कि वह जो चाहे करना चाहिए, निश्चित रूप से अज्ञान में लीन पशुओं के रूप में जन्म लेंगे। और भी अन्य मूर्ख लोग हैं, जो भौतिक धर्मपरायणता और पाप की सापेक्षता को देखते हुए, यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कोई पूर्ण भलाई नहीं है। हालाँकि, यह समझा जाना चाहिए कि कृष्ण चेतना नितांत रूप से अच्छी है क्योंकि इसमें परम सत्य, भगवान की पूर्ण आज्ञाकारिता शामिल है, जिसकी अच्छाई शाश्वत और निरपेक्ष है। जो लोग भौतिक धर्मपरायणता और पाप का अध्ययन करने के इच्छुक हैं, वे अंततः विषय वस्तु की सापेक्षता और परिवर्तनशीलता के कारण निराशा का अनुभव करते हैं। इसलिए किसी को कृष्ण चेतना के पारलौकिक मंच पर आना चाहिए, जो सभी परिस्थितियों में वैध और पूर्ण है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)