मन्त्रस्य च परिज्ञानं कर्मशुद्धिर्मदर्पणम् ।
धर्म: सम्पद्यते षड्भिरधर्मस्तु विपर्यय: ॥ १५ ॥
अनुवाद
जब किसी मंत्र का सही उच्चारण किया जाता है तो वह शुद्ध होता है और जब कोई कर्म मेरे समर्पण के उद्देश्य से किया जाता है तो वह शुद्ध माना जाता है। यह ध्यान देने योग्य है कि स्थान, समय, पदार्थ, कर्ता, मंत्र और कर्म की शुद्धि से मनुष्य धार्मिक बनता है और इन छहों की उपेक्षा करने से व्यक्ति को अधार्मिक माना जाता है।
A mantra is pure when it is pronounced correctly and an action becomes pure when it is dedicated to me. Thus a man becomes religious by purifying the place, time, object, doer, mantra and action and by neglecting these six, he is considered irreligious.
तात्पर्य
केवल सच्चा आध्यात्मिक गुरु उसे मंत्र देते हैं, और वह गुरु शिष्य को मंत्र की विधि, अर्थ और अंतिम उद्देश्य को समझाते हैं। इस युग में सच्चे आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्य को महा-मंत्र, या भगवान के पवित्र नाम, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे देते हैं। वह जो इस मंत्र का जाप करता है, खुद को भगवान का शाश्वत सेवक मानते हुए, धीरे-धीरे अपराध रहित होकर मंत्र का जाप करना सीखता है और इस तरह के शुद्ध मंत्र का जाप करके जल्दी से जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करता है। भगवान यहाँ पवित्रता और अपवित्रता पर अपनी चर्चा का सारांश देते हैं, जो अंततः धार्मिक और अधार्मिक जीवन में प्रकट होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥