श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 21: भगवान् कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  11.21.12 
धान्यदार्वस्थितन्तूनां रसतैजसचर्मणाम् ।
कालवाय्वग्निमृत्तोयै: पार्थिवानां युतायुतै: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
अन्न, लकड़ी के पात्र, अस्थियों से बनी वस्तुएँ, धागे, द्रव, आग से बनी वस्तुएँ, खाल और मिट्टी से बनी वस्तुएँ, इन सबको समय के साथ हवा, आग, धरती और पानी के सम्पर्क में आने से अपने आप शुद्ध या पवित्र हो जाता है।
 
Grains, wooden vessels, articles made of bones, threads, liquids, articles obtained from fire, articles made of leather and clay - all these are purified by time, air, fire, earth and water, either separately or by their mixing.
तात्पर्य
शब्द काल, या "समय" का यहां उल्लेख इसलिए किया गया है क्योंकि सभी शोधक प्रक्रियायें समय के अंदर ही घटित होती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)