द्रव्यस्य शुद्ध्यशुद्धी च द्रव्येण वचनेन च ।
संस्कारेणाथ कालेन महत्वाल्पतयाथवा ॥ १० ॥
अनुवाद
किसी वस्तु की शुद्धता या अशुद्धता को निर्धारित करने के लिए दूसरी वस्तु, शब्द, अनुष्ठान (संस्कार), समय के प्रभाव या आपेक्षिक महत्व का उपयोग किया जाता है।
The purity or impurity of an object is established by its use with another object, by words, by rituals, by the effect of time or by its relative importance.
तात्पर्य
वस्त्र को साफ पानी लगाने से शुद्ध होता है और पेशाब लगाने से दूषित होता है। साधु ब्राह्मण के शब्द शुद्ध होते हैं, पर भौतिकवादी व्यक्ति की ध्वनि-कंपन वासना और ईर्ष्या से दूषित होती है। एक पवित्र भक्त दूसरों को वास्तविक पवित्रता का अर्थ समझाता है, जबकि भक्तिहीन लोग झूठे प्रचार को अपनाते हैं, जिससे भोले-भाले लोग अपवित्र व पापमय क्रियाकलापों में पड़ जाते हैं। शुद्ध अनुष्ठान वे होते हैं जो परम प्रभु की संतुष्टि के लिए होते हैं, जबकि भौतिकवादी रीत वे हैं जो अपने अनुयायियों को भौतिकवादी और राक्षसी क्रियाकलापों की ओर खींच ले जाते हैं। शब्द 'संस्कारेण' भी इस बात की ओर इशारा करता है किसी विशेष वस्तु की पवित्रता या अपवित्रता को अनुष्ठानिक प्रदर्शनों के नियमों के हिसाब से पता लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, देवता को चढ़ाने के लिए एक फूल को पानी से शुद्ध करना चाहिए। लेकिन अगर फूल या खाने की चीज़ों को चढ़ाने से पहले सूंघा या चखा जा चुका हो तो उसे देवता को नहीं चढ़ाया जा सकता। शब्द 'कालेन' इस ओर इशारा करता है कि कुछ पदार्थ समय के साथ शुद्ध होते हैं तो कुछ समय के साथ अपवित्र होते हैं। उदाहरण के लिए, बारिश का पानी 10 दिन के बाद शुद्ध माना जाता है और आपात स्थिति में 3 दिनों के बाद। दूसरी ओर, कुछ खाद्य पदार्थ समय के साथ सड़ते हैं और इस तरह अपवित्र हो जाते हैं। महत्त्व के अनुसार संकेत करता है कि बड़े जलस्रोत दूषित नहीं होते हैं और अल्पतया का मतलब है कि थोड़ी मात्रा में पानी आसानी से दूषित या स्थिर हो सकता है। इसी तरह, एक महान आत्मा कभी-कभार भौतिकवादी लोगों के संपर्क में आने से दूषित नहीं होती है, जबकि जिसकी ईश्वर के प्रति भक्ति बहुत छोटी है, वह बुरे संग से आसानी से बह जाती है और संदेह में डाल दी जाती है। अन्य पदार्थों के साथ संयोजन, और वाणी, अनुष्ठान, समय और परिमाण में, सभी वस्तुओं की पवित्रता और अपवित्रता का पता लगाया जा सकता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि अपवित्र या सड़ा हुआ भोजन निश्चित रूप से सामान्य लोगों के लिए वर्जित है लेकिन जो लोग भरण-पोषण के अन्य साधन नहीं रखते हैं,उनके लिए यह स्वीकार्य है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥