श्रीनारद उवाच
एवं ते निमिना पृष्टा वसुदेव महत्तमा: ।
प्रतिपूज्याब्रुवन् प्रीत्या ससदस्यर्त्विजं नृपम् ॥ ३२ ॥
अनुवाद
श्री नारद ने कहा: हे वसुदेव, जब महाराज निमि ने नव-योगेन्द्रों से भगवद्भक्ति के बारे में पूछ लिया तो उन श्रेष्ठ साधुओं ने राजा को उनके प्रश्नों के लिए धन्यवाद दिया और यज्ञ सभा के सदस्यों तथा ब्राह्मण पुरोहितों की उपस्थिति में उनसे स्नेहपूर्वक बात की।
Sri Narada said: O Vasudeva, when Maharaja Nimi had asked the Nava-Yogendras about the devotional service of the Lord, those great sages thanked the King for his questions and spoke to him affectionately in the presence of the members of the sacrificial assembly and the Brahmin priests.
तात्पर्य
श्रीधर स्वामी के अनुसार, न केवल राजा बल्कि सभा के सदस्य और यज्ञ करने वाले पुजारी, सब भगवद भक्ति की महिमा का श्रवण करने और गान करने में समर्पित थे। कवि से प्रारम्भ करके अब ऋषि राजा के प्रश्नों का उत्तर देते हुए बारी-बारी से बोलेंगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥