श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 19: आध्यात्मिक ज्ञान की सिद्धि  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  11.19.4 
तपस्तीर्थं जपो दानं पवित्राणीतराणि च ।
नालं कुर्वन्ति तां सिद्धिं या ज्ञानकलया कृता ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
आध्यात्मिक ज्ञान के एक छोटे-से अंश से ही जो सिद्धि प्राप्त होती है, वह तपस्या करने, तीर्थस्थानों की यात्रा करने, मौन प्रार्थना करने, दान देने या अन्य धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने से प्राप्त नहीं हो सकती।
 
The perfection which results from a mere fraction of spiritual knowledge cannot be attained by performing austerities, visiting holy places, offering silent prayers, giving charity or engaging in other pious activities.
तात्पर्य
ज्ञान का यहाँ आशय सर्व शक्तिशाली प्रभु की प्रभुता की स्पष्ट समझ से है और यह बोध पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान से अलग नहीं है। प्रभु की सर्वोच्चता की पुष्टि पिछले श्लोक में 'पदम् श्रेष्ठम् विदुर मम' शब्दों से की गई है। कोई भी गर्व की मानसिकता या भौतिक प्रेरणा से तपस्या कर सकता है या पवित्र स्थानों पर जा सकता है; इसी तरह, कोई व्यक्ति कई विचित्र, पाखंडी या राक्षसी प्रेरणाओं के साथ ईश्वर से प्रार्थना कर सकता है, दान दे सकता है या अन्य बाहरी पवित्र कार्य कर सकता है। हालाँकि, भगवान कृष्ण की सर्वोच्चता का ज्ञान आध्यात्मिक दुनिया से एक ठोस संबंध है, और यदि कोई इस पवित्र समझ का अनुसरण करता है तो धीरे-धीरे चेतना के उच्चतम स्तर पर पदोन्नत हो जाता है, जिसे वैकुंठ या भगवान का राज्य कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)