श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 19: आध्यात्मिक ज्ञान की सिद्धि  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  11.19.3 
ज्ञानविज्ञानसंसिद्धा: पदं श्रेष्ठं विदुर्मम ।
ज्ञानी प्रियतमोऽतो मे ज्ञानेनासौ बिभर्ति माम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
जिन लोगों ने दार्शनिक और साधित ज्ञान के माध्यम से पूर्णता प्राप्त कर ली है, वे मेरे चरण-कमलों को सर्वोच्च दिव्य वस्तु के रूप में पहचानते हैं। इस प्रकार के विद्वान योगी मेरे लिए अति प्रिय होते हैं और अपने पूर्ण ज्ञान के साथ वे मुझे आनंदमय स्थिति में रखते हैं।
 
Those who have attained complete perfection through philosophical and empirical knowledge consider my feet to be the most divine object. Such a learned Yogi is very dear to me and with this perfect knowledge he keeps me in happiness.
तात्पर्य
पदं श्रेष्ठं विदुर् माम (वे मेरे कमल चरणों की श्रेष्ठता को समझते हैं) निश्चित रूप से अध्यात्मवादियों को संसिद्ध की श्रेणी से अलग कर देता है, या पूर्ण रूप से पूर्ण दार्शनिक हैं। भगवान कृष्ण यहाँ चार कुमारों, शुकदेव गोस्वामी, श्री व्यासदेव, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर और श्रील एसी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद जैसे महान आध्यात्मिक विद्वानों का उल्लेख करते हैं। प्रभु ने भगवद्-गीता (7.17-18) में भी कहा है:

तेषां ज्ञानी नित्य-युक्त

एक-भक्तिर विशेष्यते

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थं

अहं स च मम प्रियः

"इनमें से, वह ज्ञानी जो मेरे साथ शुद्ध भक्ति सेवा के माध्यम से पूर्ण ज्ञान और जुड़ाव में है, सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि मैं उनसे बहुत प्रिय हूं, और वे मुझे प्रिय हैं।"

उदारः सर्व एवैते

ज्ञानी त्व आत्मैव मे मतं

आस्थितः स हि युक्तात्मा

माम एवानुत्तमां गतिम्

"ये सभी भक्त निस्संदेह उदार आत्माएं हैं, लेकिन जो मेरे ज्ञान में स्थित है, मैं उसे अपने में रहने वाला मानता हूं। मेरी आध्यात्मिक सेवा में संलग्न होकर, वह मुझे प्राप्त करता है।"

ज्ञान वास्तविकता की एक अधिकृत दार्शनिक और विश्लेषणात्मक धारणा को संदर्भित करता है, और जब चेतना के पवित्रिकरण के माध्यम से ऐसे ज्ञान को स्पष्ट रूप से महसूस किया जाता है, तो परिणामी व्यापक अनुभव को विज्ञान कहा जाता है। सैद्धांतिक, अवैयक्तिक ज्ञान वास्तव में जीवित इकाई के दिल को शुद्ध नहीं करता है, बल्कि उसे भगवान के व्यक्तित्व को भूलने में और भी गहरा कर देता है। जिस तरह एक पिता हमेशा अपने बेटे की शिक्षा पर गर्व करता है, उसी तरह, भगवान कृष्ण भी जीवों को एक अच्छी आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करते हुए और इस तरह भगवान के पास वापस जाने के रास्ते पर प्रगति करते हुए देखकर बहुत खुश होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)