तेषां ज्ञानी नित्य-युक्त
एक-भक्तिर विशेष्यते
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थं
अहं स च मम प्रियः
"इनमें से, वह ज्ञानी जो मेरे साथ शुद्ध भक्ति सेवा के माध्यम से पूर्ण ज्ञान और जुड़ाव में है, सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि मैं उनसे बहुत प्रिय हूं, और वे मुझे प्रिय हैं।"
उदारः सर्व एवैते
ज्ञानी त्व आत्मैव मे मतं
आस्थितः स हि युक्तात्मा
माम एवानुत्तमां गतिम्
"ये सभी भक्त निस्संदेह उदार आत्माएं हैं, लेकिन जो मेरे ज्ञान में स्थित है, मैं उसे अपने में रहने वाला मानता हूं। मेरी आध्यात्मिक सेवा में संलग्न होकर, वह मुझे प्राप्त करता है।"
ज्ञान वास्तविकता की एक अधिकृत दार्शनिक और विश्लेषणात्मक धारणा को संदर्भित करता है, और जब चेतना के पवित्रिकरण के माध्यम से ऐसे ज्ञान को स्पष्ट रूप से महसूस किया जाता है, तो परिणामी व्यापक अनुभव को विज्ञान कहा जाता है। सैद्धांतिक, अवैयक्तिक ज्ञान वास्तव में जीवित इकाई के दिल को शुद्ध नहीं करता है, बल्कि उसे भगवान के व्यक्तित्व को भूलने में और भी गहरा कर देता है। जिस तरह एक पिता हमेशा अपने बेटे की शिक्षा पर गर्व करता है, उसी तरह, भगवान कृष्ण भी जीवों को एक अच्छी आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करते हुए और इस तरह भगवान के पास वापस जाने के रास्ते पर प्रगति करते हुए देखकर बहुत खुश होते हैं।
