श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 19: आध्यात्मिक ज्ञान की सिद्धि  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  11.19.26 
यदर्पितं तद् विकल्पे इन्द्रियै: परिधावति ।
रजस्वलं चासन्निष्ठं चित्तं विद्धि विपर्ययम् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
जब चेतना भौतिक देह, घर और इंद्रियों की संतुष्टि की अन्य समान वस्तुओं पर स्थिर हो जाती है, तो व्यक्ति इंद्रियों की सहायता से भौतिक वस्तुओं का पीछा करते हुए अपना जीवन व्यतीत करता है। इस प्रकार रजोगुण से प्रबल प्रभावित चेतना क्षणभंगुर वस्तुओं के प्रति समर्पित हो जाती है और इस तरह अधर्म, अज्ञान, आसक्ति और नीचता उत्पन्न होती है।
 
When man's consciousness becomes fixed on the material body, house and other such objects of sense gratification, he spends his life running after material objects with the help of the senses. Thus the consciousness, strongly influenced by the mode of passion, becomes devoted to perishable objects, which gives rise to irreligion, ignorance, attachment and meanness (miserliness).
तात्पर्य
पिछले श्लोक में भगवान कृष्ण ने उनके प्रति मन लगाने के शुभ परिणामों को बताया है, और अब इसका उलटा स्पष्ट किया जा रहा है। रजस-वलम इस बात का संकेत करता है कि किसी के जुनून इतने प्रबल हो जाते हैं कि वह पापपूर्ण गतिविधियों में लिप्त हो जाता है और सभी प्रकार के दुर्भाग्य को प्राप्त होता है। यद्यपि भौतिकवादी लोग अपनी आसन्न दयनीयता के प्रति अंधे होते हैं, कोई सभी प्रकार के साक्ष्यों से - अर्थात वैदिक आज्ञाओं, प्रत्यक्ष अवलोकन, पारंपरिक ज्ञान और आगमनात्मक तर्क से - पुष्टि कर सकता है कि ईश्वर के नियमों का उल्लंघन करने का परिणाम विनाशकारी होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)