श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम् ।
परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभि: स्तवनं मम ॥ २० ॥
आदर: परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम् ।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मति: ॥ २१ ॥
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम् ।
मय्यर्पणं च मनस: सर्वकामविवर्जनम् ॥ २२ ॥
मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च ।
इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद् व्रतं तप: ॥ २३ ॥
एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम् ।
मयि सञ्जायते भक्ति: कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते ॥ २४ ॥
अनुवाद
मेरी लीलाओं के खुशनुमा वर्णनों में दृढ़ विश्वास, मेरी महिमा का लगातार वर्णन, मेरी भक्ति में गहरी निष्ठा, सुंदर स्तुति के माध्यम से मेरा गुणगान, मेरी भक्ति का सम्मान, पूरी तरह झुककर नमन करना, मेरे भक्तों की उच्चतम सेवा, सभी जीवों में मेरे होने का एहसास, मेरे प्रति सामान्य शारीरिक गतिविधियों की भक्ति भावना, अपने गुणों का वर्णन करने के लिए शब्दों का उपयोग करना, मुझे अपना मन अर्पित करना, सभी भौतिक इच्छाओं को छोड़ देना, मेरी भक्ति के लिए संसाधनों को त्यागना, भौतिक इंद्रिय सुख और खुशियाँ छोड़ना, और दान, न्यौछावर करना, कीर्तन, व्रत, तप जैसी वांछनीय गतिविधियाँ करना ताकि मैं मिल सकूँ – ये वास्तविक धार्मिक सिद्धांत हैं, जिनसे मेरे शरण में आए हुए लोग अपने आप ही मुझसे प्रेम करने लगेंगे। तो फिर मेरे भक्त के लिए कौन-सा अन्य उद्देश्य या लक्ष्य बाकी रह जाता है?
Firm faith in the blissful stories of My pastimes, constant chanting of My glories, deep attachment to My regular worship, praising Me with beautiful hymns, acknowledging My devotion, prostrating oneself, performing the best worship of My devotees, knowing My consciousness in all living entities, dedicating one's normal bodily functions to My devotion, using speech to describe My qualities, devoting one's mind to Me, renunciation of all material desires, renunciation of wealth for My devotion, renunciation of material sense-gratification and pleasure, and performing desirable activities such as charity, sacrifices, chanting, fasts, austerities, etc., for the purpose of attaining Me—these are the real religious principles by which those who surrender to Me automatically develop love for Me. Then what other purpose or goal remains for My devotee?
तात्पर्य
इस श्लोक में 'मद्भक्ता पूजाभ्यधिक' शब्द महत्वपूर्ण हैं। अभ्यधिक का अर्थ है 'उत्कृष्ट गुणवत्ता।' भगवान उन लोगों से अत्यंत प्रसन्न होते हैं जो उनके शुद्ध भक्तों की पूजा करते हैं, और उनको तदनुसार पुरस्कृत करते हैं। भगवान द्वारा अपने शुद्ध भक्तों का उदार मूल्यांकन किए जाने के कारण, शुद्ध भक्तों की पूजा की भगवान की स्वयं की पूजा से श्रेष्ठ बताया गया है। 'मदर्थेष्व अंग चेष्टा' शब्द बताते हैं कि दांत साफ करना, स्नान करना, भोजन करना आदि जैसी साधारण, शारीरिक गतिविधियों को भी परम भगवान को भक्ति सेवा के रूप में समर्पित किया जाना चाहिए। 'वचसा मदगुणकीर्तनम्' शब्द इंगित करते हैं कि कोई साधारण, क्रूड भाषा में बोलता है या विद्वतापूर्ण काव्यपूर्ण शैली में, व्यक्ति को भगवान की महिमा का वर्णन करना चाहिए। 'मदर्थेऽर्थ-परित्यागः' शब्द बताते हैं कि व्यक्ति को अपना धन भगवान की महिमा करने वाले त्योहारों, जैसे रथ-यात्रा, जन्माष्टमी और गौर-पूर्णिमा के लिए व्यय करना चाहिए। साथ ही, यहाँ व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक गुरु और अन्य वैष्णवों के मिशन की सहायता के लिए धन खर्च करने का निर्देश दिया गया है। धन जिसका भगवान की सेवा में ठीक से उपयोग नहीं किया जा सकता है और इस प्रकार यह व्यक्ति की स्पष्ट चेतना में बाधा है, उसे पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए। 'भोगस्य' शब्द इन्द्रिय सुख को संदर्भित करता है, जिसका नेतृत्व यौन सुख द्वारा होता है, और 'सुखस्य' संवेदनात्मक भौतिक खुशी को संदर्भित करता है, जैसे कि अत्यधिक पारिवारिक लगाव। 'दत्तं हुतम' शब्द इंगित करते हैं कि व्यक्ति को ब्राह्मणों और वैष्णवों को घी में पकाया गया प्रथम श्रेणी का भोजन अर्पित करना चाहिए। व्यक्ति को विष्णु भगवान को अधिकृत यज्ञीय अग्नि में अन्न और घी के साथ स्वाहा ध्वनि का उच्चारण करना चाहिए। 'जप्त' शब्द बताता है कि व्यक्ति को लगातार भगवान के पवित्र नामों का उच्चारण करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥