श्रीभगवानुवाच
यो विद्याश्रुतसम्पन्न: आत्मवान् नानुमानिक: ।
मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ १ ॥
अनुवाद
भगवान ने कहा: जिस स्वरूपसिद्ध व्यक्ति ने प्रकाश पाने तक शास्त्रीय ज्ञान का अनुशीलन किया है और जो भौतिक ब्रह्माण्ड को मात्र मोह समझ कर, निर्विशेष चिन्तन से मुक्त होता है, उसे चाहिए कि वह उस ज्ञान को और उसे प्राप्त करने वाले साधनों को मुझे समर्पित कर दे।
The Lord said: The self-realized person who has studied the scriptures until he attains enlightenment and who is free from impersonal thoughts, knowing the material universe to be a mere illusion, should surrender that knowledge and the means to acquire it to Me.
तात्पर्य
माया-मात्रम् इदम् ज्ञात्वा यह ज्ञान दर्शाता है कि शाश्वत आत्मा और शाश्वत ईश्वर भगवान् भौतिक संसार के क्षणिक गुणों से एकदम अलग हैं। विद्या-श्रुत-सम्पन्न शब्द का अर्थ है कि ज्ञान को केवल प्रबोधन के लिए प्राप्त करना चाहिए। रहस्यवाद, बौद्धिकता या अवैयक्तिक अनुमान प्रदर्शित करने के लिए नहीं। माया के भ्रामक प्रभावों को निष्प्रभावी बनाने के बाद, व्यक्ति को आध्यात्मिक प्रभु पर अपना ध्यान और भक्ति देकर दार्शनिक निषेध को स्वयं प्रभु को सौंपना चाहिए। श्रील जीव गोस्वामी उदाहरण देते हैं कि जब कोई खतरा होता है तो राजा निजी नागरिकों को हथियार दे सकता है, लेकिन सैन्य जीत के बाद व्यक्तिगत नागरिक हथियार राजा को वापस लौटा देते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस श्लोक के इस बिंदु को इस प्रकार समझाते हैं। किसी न किसी तरह जीव को भौतिक भ्रम से खुद को मुक्त करना होगा, जिसने उसे अनादि काल से ढा रखा है। रहस्यवादी योग पद्धति का अभ्यास करके इच्छाहीनता और त्याग को विकसित करते हुए, जीव में भ्रम का ज्ञान विकसित होता है और इस प्रकार वह खुद को भौतिक अज्ञानता से ऊपर उठा सकता है। हालाँकि, एक बार जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक धरातल पर स्थित हो जाता है, तो भ्रम का ज्ञान और ऐसे ज्ञान को प्राप्त करने की प्रक्रिया का कोई और व्यावहारिक अनुप्रयोग नहीं रह जाता। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर उदाहरण देते हैं कि एक व्यक्ति को सांप या बाघ के भूत से सताया जा सकता है। जब तक मनुष्य के पास होता है और सोचता है, "मैं एक सांप हूँ" या "मैं एक बाघ हूँ", तब तक गहने, मंत्रों और जड़ी-बूटियों के प्रयोग द्वारा भूतिया प्रभाव का प्रतिकार करने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन जब व्यक्ति को भूतों के कब्जे से मुक्त कर दिया जाता है, तो वह फिर से सोचता है, "मैं श्रीमान अमुक हूँ, श्रीमान अमुक का पुत्र हूँ", और अपने मूल स्वरूप में वापस आ जाता है। उस समय, गहने, मंत्र और जड़ी-बूटियों का कोई और तत्काल आवेदन नहीं होता है। इस श्लोक में विद्या शब्द उस ज्ञान को इंगित करता है जो दार्शनिक विश्लेषण, रहस्यवादी योग, तपस्या और त्याग के माध्यम से प्राप्त किया गया है। इस दुनिया की अस्थायी, भ्रामक प्रकृति का ऐसा ज्ञान अज्ञान का प्रतिकार करता है, और कई वैदिक शास्त्र हैं जो जीव को ऐसे ज्ञान में प्रशिक्षित करते हैं। धीरे-धीरे व्यक्ति भौतिक शरीर और मन और उन भौतिक वस्तुओं के साथ अपनी झूठी पहचान छोड़ देता है जो शरीर और मन के साथ संपर्क करते हैं। ऐसे प्रतिकारक ज्ञान को प्राप्त करने के बाद, व्यक्ति को ईश्वर के प्रति प्रेमपूर्ण सेवा में संलग्न होना चाहिए और एक शुद्ध भक्त बनना चाहिए। जब व्यक्ति कृष्ण चेतना में पूरी तरह से पूर्ण हो जाता है, तो स्वाभाविक रूप से भ्रम के असंख्य विवरणों में बहुत कम रुचि होती है, और धीरे-धीरे व्यक्ति आध्यात्मिक दुनिया में स्थानांतरित हो जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥