श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 18: वर्णाश्रम धर्म का वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  11.18.12 
यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु ।
विरागो जायते सम्यङ् न्यस्ताग्नि: प्रव्रजेत्तत: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
यदि वानप्रस्थ यह जानते हुए कि ब्रह्मलोक को प्राप्त कर पाना भी एक दयनीय स्थिति है, सकाम कर्मों के सभी संभावित परिणामों से पूरी तरह से विरक्ति को प्राप्त कर लेता है, तो वह संन्यास आश्रम ग्रहण कर सकता है।
 
If, realizing that even attaining Brahmaloka is a pitiable condition, a Vanaprastha develops complete detachment from all possible consequences of Sakaam Karma, he can adopt Sannyasa Ashrama.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)