श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  11.17.9 
श्रीभगवानुवाच
धर्म्य एष तव प्रश्न‍ो नै:श्रेयसकरो नृणाम् ।
वर्णाश्रमाचारवतां तमुद्धव निबोध मे ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा: हे उद्धव, तुम्हारा प्रश्न धार्मिक नियमों के अनुकूल है और इसलिए यह सामान्य मनुष्यों और वर्णाश्रम प्रणाली का पालन करने वालों दोनों के लिए जीवन में सर्वोच्च सिद्धि, यानी शुद्ध भक्ति को जन्म देता है। अब तुम मुझसे उन परम धार्मिक नियमों को सीखो।
 
The Lord said: O Uddhava, your question is in accordance with the religious rules, and thus it gives rise to the highest attainment in life, that is, pure devotion, both for ordinary men and for those who follow the Varnashrama system. Now learn from me those supreme religious rules.
तात्पर्य
नाइःश्रेयस्‍-कर शब्द से यह संकेत मिलता है कि वह क्‍या है जो जीवन की सर्वोच्‍च पूर्णता, कृष्‍ण चेतना को प्रदान करता है, जो प्रभु श्री उद्धव को समझा रहे हैं। धार्मिक सिद्धांतों पर वि‍चार करते समय, सामान्‍य मनुष्‍य सांसारिक विचारों में उलझे रहते हैं। उस प्रक्रिया को जो जीवन की सर्वोच्‍च पूर्णता प्रदान करती है, मनुष्‍य के लिए सबसे शुभ माना जाना चाहिए। वर्णाश्रम प्रणाली पृथ्‍वी पर धार्मिकता का सबसे वैज्ञानिक प्रस्‍तुतीकरण है और इस प्रणाली में जो सबसे पूर्ण होता है, वह कृष्‍ण चेतना की स्थिति में आ जाता है या सर्वोच्‍च प्रभु की संतुष्‍टि के लिए हर चीज को समर्पित कर देता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)