श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  11.17.58 
एवं गृहाशयाक्षिप्तहृदयो मूढधीरयम् ।
अतृप्तस्ताननुध्यायन् मृतोऽन्धं विशते तम: ॥ ५८ ॥
 
 
अनुवाद
इस तरह, अपनी मूर्खतापूर्ण सोच के चलते, वह गृहस्थ जिसका हृदय पारिवारिक मोह के कारण अभिभूत रहता है, कभी संतुष्ट नहीं होता। लगातार अपने परिवार के बारे में सोचते हुए वह मर जाता है और अज्ञानता के अँधेरे में चला जाता है।
 
Thus, due to his foolish attitude, the householder, whose heart is overwhelmed with family attachment, is never satisfied. As a result, while constantly thinking about his family members, he dies and enters the darkness of ignorance.
तात्पर्य
अंधं विश्‍याते तम: यह इस ओर संकेत करता है कि उसके अगले जीवन में एक मोहग्रस्‍त गृहस्‍थ निश्‍चय ही निम्न योनि में जाएगा क्योंकि उसकी शारीरिक मोह की आदिम मानसिकता है, जिसे मूढ़-धी कहते हैं। दूसरे शब्‍दों में, अपने आपको हर चीज का केंद्र मानकर इंद्रिय सुख भोगने के बाद, वह जीवन की निम्न प्रजातियों में चला जाता है। किसी भी तरह से, हमें अपना मन भगवान कृष्‍ण पर लगाना चाहिए और अपने असली जीवन में कृष्‍ण चेतना के अज्ञान के अंधकार से बाहर आना चाहिए।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत सत्रहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)