श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  11.17.52 
कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत् कुटुम्ब्यपि ।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येदद‍ृष्टमपि द‍ृष्टवत् ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
परिवार के कई आश्रितों की देखभाल करने वाले गृहस्थ को न तो उनसे बहुत अधिक लगाव रखना चाहिए और न ही खुद को स्वामी मानकर मानसिक असंतुलन में रहना चाहिए। बुद्धिमान गृहस्थ को यह समझना चाहिए कि सभी संभावित सुख, जिसका वह पहले ही अनुभव कर चुका है, क्षणभंगुर हैं।
 
A householder who takes care of many dependent family members should neither get too attached to them nor remain mentally unbalanced by considering himself the master. A wise householder should understand that all the possible happiness, which he has already experienced, is ephemeral.
तात्पर्य
एक परिवार वाला व्यक्ति अक्सर एक राजा की तरह काम करता है, अपनी पत्नी की रक्षा करता है, अपने बच्चों को आदेश देता है, नौकरों, पोते-पोतियों, पालतू जानवरों आदि की देखभाल करता है। शब्द 'ना प्रमाद्येत कुटुम्बी अपि' से पता चलता है कि यद्यपि कोई अपने परिवार, नौकरों और दोस्तों से घिरे एक छोटे से राजा की तरह काम करता है, तो भी उसे झूठे गर्व के कारण मानसिक रूप से असंतुलित नहीं होना चाहिए, और खुद को असली राजा नहीं मानना चाहिए। शब्द 'विपश्चित' बताता है कि व्यक्ति को संयमी और बुद्धिमान बने रहना चाहिए, और खुद को सर्वोच्च प्रभु का शाश्वत सेवक होने को कभी नहीं भूलना चाहिए।

उच्च, मध्यम और निम्न वर्ग के गृहस्थ विभिन्न प्रकार के इंद्रिय सुखों से जुड़ जाते हैं। हालाँकि, किसी भी आर्थिक या सामाजिक वर्ग में, यह याद रखना चाहिए कि सभी भौतिक सुख, यहाँ या अगले जन्म में, अस्थायी और अंततः व्यर्थ हैं। एक ज़िम्मेदार गृहस्थ को अपने परिवार के सदस्यों और अन्य आश्रितों को वापस घर, वापस भगवान के पास, आनंद और ज्ञान के शाश्वत जीवन के लिए मार्गदर्शन करना चाहिए। व्यक्ति को थोड़ी देर के लिए एक झूठा और घमंडी राजा नहीं बनना चाहिए, क्योंकि तब वह अपने परिवार के सदस्यों के साथ, जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधा रहेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)