यदि कोई ब्राह्मण अपने नित्य कर्मों से अपना भरण-पोषण नहीं कर पाता और कष्ट में है, तो वह व्यापारी का धंधा अपना सकता है और सामानों को खरीद-बेचकर अपनी दयनीय अवस्था से बाहर निकल सकता है। यदि व्यापारी बनकर भी वह बहुत गरीब बना रहे, तो वह हाथ में तलवार लेकर क्षत्रिय-वृत्ति अपना सकता है। किंतु किसी भी स्थिति में वह किसी साधारण मालिक को मानकर कुत्ते की तरह नहीं बन सकता (कुत्ते जैसा व्यवहार नहीं कर सकता)।
If a Brahmin is unable to perform his regular duties and suffers, he can improve his miserable condition by adopting the profession of a trader and buying and selling goods. If he remains extremely poor even as a trader, he can adopt the profession of a Kshatriya by taking a sword in his hand. But under no circumstances can he accept any ordinary master and become like a dog (Shvana-vritti).
तात्पर्य
श्व-वृत्ति, या "कुत्ते का पेशा", शूद्रों को संदर्भित करता है, जो एक मालिक को स्वीकार किए बिना नहीं रह सकते हैं। एक दरिद्र ब्राह्मण जो असहनीय रूप से पीड़ित हो रहा है, एक व्यापारी बन सकता है और फिर एक क्षत्रिय बन सकता है, लेकिन कभी भी किसी कंपनी में काम करके या किसी मालिक को स्वीकार करके शूद्र की स्थिति नहीं ले सकता है। यद्यपि एक क्षत्रिय को आम तौर पर वैश्य से अधिक ऊंचा माना जाता है, प्रभु यहाँ सलाह देते हैं कि संकटग्रस्त ब्राह्मण पहले वैश्य व्यवसाय को स्वीकार करें, क्योंकि इसमें हिंसा नहीं होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥